Thursday, June 9, 2016

ईसाई-धर्मान्तरण

दुर्गा माँझी और रामजीत मुर्मू लंगोटिया यार थे … परिवार के भरण-पोषण और जीविका चलाने के अधिकतर काम साथ-साथ में ही करते थे…  साथ में जंगल जाना … सूखी लकड़ियाँ काटना … कंधे में लाद के घर लाना … बारी में मचान के नीचे जमा करना …और  फिर उन लकड़ियों को साइकिल में लाद के कस्बों और शहर के होटलों में जा के बेचना … एक-दूसरे के सुख-दुःख में हरदम साथ रहते … सरहुल मानते, कर्मा मनाते, दासांय मनाते … साथ में हड़िया,महुआ पीते … सावन के महीनों में अपने पास के छोटी-मोटी खेतों की रोपाई के बाद दूसरे बड़े किसानों के घर जाकर मजूरी करते .. या फिर कभी-कभी अपने रिश्तेदारों के यहाँ भी मदद करने के लिए चले जाते ..!!  लेकिन थे बड़े ही पक्के दोस्त !!
गरीबी तो थी .. या ये कहिये कि बहुत जादे गरीबी थी .. बड़े लोगों के यहाँ मजूरी करके और लकड़ी बेच के ही किसी तरह जीवन की गाड़ी को खीच रहे थे.. बच्चे गाँव के ही सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते .. खिचड़ी खाते … कभी-कभी मास्टर जी के नज़रों से छुपकर स्कूल का दीवार फांदकर खिचड़ी अपनी माँ को भी ला के दे देते थे। … मम्मी बच्चे की इस वीरता से खुश हो कर कभी कभार चवन्नी अठन्नी पकड़ा देती थी। … बस जिंदगी कुछ यूँ ही चल रही थी।

एक बार दुर्गा मांझी धान मेसाई के टाइम पे अपनी बहन को मदद करने के लिए उसके घर चला गया … 20-22 दिन बाद वापिस लौटा .. इधर भी धान मेसाइ के काम लगभग खत्म हो चुके थे … अगली सुबह वो रामजीत मुर्मू के घर गया .. जंगल से लकड़ी काटने हेतू साथ में चलने के लिए … जैसे ही उसके आँगन में प्रवेश किया … बहुत कुछ बदला-बदला सा लगा …. घर आँगन की रौनक बढ़ गई थी.. और बढ़ाने का काम चालु था .. सीमेंट की बोरियां और बालू आँगन में जमा था .. आँगन में मनमोहक इत्र की खुशबू भी आ रही थी .. दुर्गा के मन में बहुत सारे सवाल उठने लगे .. ‘यार रामजीत को कोई लॉटरी वॉटरी लग गई क्या इन 20 दिनों के अंदर ही जो ऐसा बदलाव देखने को मिल रहा हैं!!’…. इसी उधेड़बुन में वह रामजीत को आवाज़ लगाता हैं “ रामजीत … अरे ओ रामजीत .. कहाँ है रे ?? “ …
“ के ??? … दुर्गा दा .. ?? “  अंदर कमरे से अर्धनिद्रित रामजीत की आवाज़ आती है ।
“हाँ “
“अच्छा दुर्गा दा … ज़रा सा रुकिए … अभी आवत है !”
फिर रामजीत मुर्मू अंदर से गमछा संभालते और मुँह पोंछते हुए बाहर निकलता है .. दुर्गा मांझी को देखते ही जोहार करके अभिवादन करता है . और सामने पड़े खटिया में बैठने को बोलता है … दोनों बैठते और बातचीत शुरू होती है
“ कब आये दुर्गा दा दीदी घर से ?”
“कल ही रात को आये है … सोचे रात में तुमसे भेंट कर लूँ .. लेकिन थक गया था .. तो सोचा कि सुबह ही मिल लेता हूँ “
“अच्छा … अच्छा … और दीदी घर में सब काम अच्छे से हो गया न ? “
“हाँ .. हाँ … सब काम अच्छे से हो गया “.
“चाय पीयेंगे दुर्गा दा ?” .. (और दुर्गा दा की सहमति के पहले ही अपनी बीवी को चाय बनाने का आदेश दे देता है ।)
“और बताइये दुर्गा दा … कुछ नया !!”
“अब नया का बताये रामजीत बाबू … जो जैसा था सब वैसे ही है … नया-नया तो तुम्हारे घर नज़र आ रहा है !! … लगता है इसबार कोई अच्छा पार्टी मिल गया काम करने को .. और लगता है ज़रूरत से जादा पगार भी दिया गया है … तभी तो घर की रौनक बढ़ रही है !! “
“ अरे ऐसा कुछ नहीं है दुर्गा दा … हमने तो इस बार किसी के यहाँ काम भी नहीं किया है !”
“क्या बात कर रहा है !!!! … किसी के यहाँ काम भी नहीं किया और घर का इतना सारा काम करवा है !! .. कैसे भाई …. कोनो लॉटरी लग गया क्या ?? “ दुर्गा माँझी आश्चर्यचकित होते हुए पूछता है।
“ लॉटरी ??? … हाँ कुछ ऐसा ही समझिये दुर्गा दा … कि हमारी लॉटरी लग गई !!
फिर वो अपनी बनियान के अंदर दबी हुई “क्रूस’’ की माला निकालता है और दुर्गा मांझी को दिखाते हुए और चूमते हुए बोलता है ..
“ दुर्गा दा … हमको परमेश्वर की लॉटरी लग गई है !! … अब हमको किसी के यहाँ जा के काम करने की ज़रूरत नहीं हैं… और  न ही लकड़ी बेचने की ज़रूरत है … जब से परमेश्वर की शरण में गए है … सब शुभ हो रहा है … ये घर में जो काम हो रहा है न सब उन्हीं की देन हैं … मेरे बच्चे जीतन और मीतन का गाँव के खिचड़ी वाला स्कूल छोड़ के वो संत जेबियर स्कूल में एडमिसन हो गया है ।।“.
“ बाप रे !! तुम्हारे बच्चे संत जेबियर स्कूल में जाने लगे !! … अरे लेकिन वहाँ तो बहुत भारी भरकम फीस लगता हैं … बहुत ही अमीर-अमीर घर के बच्चे वहाँ पढ़ते हैं … और तुम्हारे बच्चे वहाँ पढ़ने लगे ?? … भाई ये सब कैसे हो गया ?? .. और आगे इसे कैसे मेंटेन रख पाओगे ??”
तब तक रामजीत की बीवी चाय का गिलास दोनों को थमा देती है … फिर दोनों चाय की चुस्कियां लेते हुए बात को आगे बढ़ाते है ..
रामजीत “ सब बाबा यहोवा और परमेश्वर की कृपा है दुर्गा दा !! … मेरे बच्चे वहाँ मुफ़्त में पढ़ रहे है कोई फ़ीस वीस नहीं … मेरे को भी महीने के 5,000 रुपया मिलेंगे !”
“बच्चे मुफ़्त में पढ़ेंगे ?? … महीने के पाँच हज़ार रूपये भी मिलेंगे ?? … भाई कैसे और क्यों ?? .. ज़रा सही-सही बताओ माज़रा क्या है ??”
“ दुर्गा दा  18 दिन पहले हमारे यहाँ फादर आये थे … साथ में हमारे ही 8-10 संथाली बन्धु थे .. उनलोगों ने हमसे बहुत ही प्रेम और सम्मान से बात किया … उतना सम्मान से तो आज तक कोई पढ़ा-लिखा आदमी बात नहीं किया था .. फिर वो प्रभु यीशु और परमेश्वर की बात बताने लगे … उन्होंने बहुत ही अच्छे से समझाया कि प्रभु यीशु कोई और नहीं हमारे ‘मरांग बुरु’ ही है। … फिर उन्होंने बताया कि उनके शरण में जाने से हमें क्या मिलेगा .. मेरे परिवार को क्या मिलेगा … मेरे बच्चों को क्या मिलेगा .. वगेरह .. वगेरह. !! … फिर हमने परमेश्वर की शरण में जाने का निर्णय लिया और हामी भर दी … सन्डे के दिन हमने अपने आप को परमेश्वर के हवाले कर दिया … डेढ़ लाख रुपया तुरंत ही मिला … और अगले दिन ही हमारे बच्चों को लेने आ गए संत जेबियर स्कूल में एडमिसन कराने के लिए !”
इतने में ही उनके बच्चे भी दौड़ते हुए आँगन में आ जाते है .. दुर्गा माँझी को देखते ही अठन्नी मांगने की जिद्द करने लगते हैं .. दुर्गा माँझी बच्चों की जिद्द के आगे हार जाता है और धोती में बंधे पोटली से 2 अठन्नी के सिक्के निकाल के दोनों बच्चों को थमा देते हैं .. और फिर बड़े प्यार से बोलते है “ जाओ बेटा जीतन और मीतन .. लेमचूस खा लेना इससे .. “  इतने में ही जीतन बोल पड़ता है ..
“चाचा .. मेरा नाम अब जीतन नहीं है .. माई नेम इज ‘जेवियर मुर्मू’ एंड हिज नेम इज ‘माइकल मुर्मू’ .. “
दुर्गा मांझी उन दोनों का चेहरा देखता है … प्यार से हाथ फेरता है फिर लेमचूस खाने के लिए दूकान भेज देता है।
फिर रामजीत मुर्मू से कहता है “ रामजीत ये तुमने अच्छा नहीं किया … मात्र कुछ पैसों के लिए अपने धर्म का सौदा कर दिया … माना हम बहुत गरीब है … परिवार चलाना मुश्किल पड़ता है .. लेकिन परिवार चलाने और कुछ पैसों के लिए अपना धर्म त्यागना बिल्कुल भी उचित नहीं लगता … हमसे जादा गरीब तो हमारे बाप-दादा भी थे .. लेकिन उन्होंने ऐसा समझौता नहीं किया … लेकिन तुमने !!! “
“आखिर हम ऐसे कितने दिन जीये दादा ? .. मारंग-बुरु और परमेश्वर सब एक ही है … और जब परमेश्वर की कृपा से इतना कुछ मेरे जीवन में और मेरे परिवार के साथ हो रहा है तो … क्या फ़र्क़ पड़ता है मारंग-बुरु में और परमेश्वर में ?? !! .. दादा मेरी मानो तो अगले सन्डे आप भी हमारे साथ चर्च चलो … आपके परिवार सहित आपके बच्चों का भी भविष्य संवरेगा !”.
“अरे रामजीत बाबू … छोड़ो अब … मुझे नहीं जाना किसी चरच वरच में … तुम्हारा नया परमेश्वर तुम्हें मुबारक हो लेकिन मैं अपने पुरखों और मारंग-बुरु के साथ धोखा नहीं कर सकता।“.
इतना कह के दुर्गा माँझी अपना टांगी उठाता है और जंगल की ओर निकल पड़ता है…
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समय बीतता जाता हैं … दुर्गा मांझी के सामने ही गाँव के 80% आदिवासी भाई क्रिश्चियन बन जाते हैं .. फादरों के प्रचार-प्रसार के दौरान ही दुर्गा मांझी कभी-कभार फादरों से पूछ बैठता था , “ फादर .. मारंग-बुरु और परमेश्वर सब तो एक ही हैं तो फिर केवल क्रिश्चनों के बच्चे ही काहे संत जेबियर स्कूल में पढ़ रहे हैं ?? … हमारे बच्चे काहे नहीं ?? ..
“देखो माई बिलव्ड चाइल्ड .. तुम्हारे बच्चे लगे तो कल से ही स्कूल जा सकते हैं .. बशर्ते आपको पूरी फीस देना पड़ेगा … और अगर फीस नहीं देना चाहते हो तो फिर परमेश्वर की शरण में आ जाओ .. सब फीस माफ़ .. ऊपर से पैसे मिलेंगे वो अलग से “
परमेश्वर का नाम सुनते ही दुर्गा माँझी अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में ही पढ़ाना श्रेयस्कर मानता हैं।
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आज बीस बरस बाद जेवियर मुर्मू IAS अफ़सर बन चूका है और माइकल मुर्मू शिक्षा विभाग में उच्च पदाधिकारी है !!
वहीँ दुर्गा मांझी के बेटे दीनू मांझी और शिबू मांझी अपने बाप के काम को आगे बढ़ा रहे है .. जैसा दुर्गा मांझी था वैसे ही उसके बच्चे .. बस इतना सा फ़रक आया है कि इनके बच्चे अब कमाने-धमाने लिए मुम्बई-दिल्ली-सूरत जैसे बड़े शहरों की ओर पलायन करने लगे हैं।। ..
आज गाँव में जो 20% अनकंवर्टेड आदिवासी हैं उन सब को 80% वालों द्वारा हमेशा ही उलाहना दिया जाता रहता है .. ‘देख तूम परमेश्वर की शरण में नहीं आये तो क्या हुआ … जैसी कल सड़ी-गली ज़िन्दगी जीते थे वैसे ही आज भी जी रहे हो.. क्या फर्क पड़ा हैं तुम्हारा क्रिश्चियन न बनने से  .. और अगर आज भी परमेश्वर की शरण में नहीं आये तो .. कल को भी तुम वैसे ही रहोगे !!’
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अब ये जो 20% बचे है कल को ज़रूर 0% में बदल जाएंगे !! ये पक्की गारंटी हैं।
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आखिर ये ईसाई मिशनरियां इतने सारे रूपये क्यों खर्च कर रही हैं … काहे कर रही हैं … और किसलिए कर रही हैं ?? .. और ये भोले-भाले अनपढ़ आदिवासियों और सबसे निचले तबकों वालों को ही टारगेट में क्यों रख रहे हैं ?? किसी अन्य जातियों को क्यों नहीं ??
क्योंकि यहाँ इनका काम सबसे आसान और सरल तरीके से सम्पादित होता हैं .. और 20-25 साल बाद जेवियर मुर्मू और माइकल मुर्मू जैसे पूर्ण-रूपेण ईसाई योद्धा प्राप्त होते हैं। .. योद्धा ?? … जी हाँ योद्धा ही तो  .. तन से आदिवासी और मन से ईसाई !.. क्योंकि  धर्म के बिकने के साथ ही मनुष्य की सांस्कृतिक और नैतिक आख्या भी बिक जाती है ,और फिर ये बिका हुआ व्यक्ति यदि एक दिन अपनी जन्म भूमि ,अपना राष्ट्र भी बेचने को तैयार हो जाये तो क्या आश्चर्य !.. क्योंकि फिर बेचना और बिकना ही उसका सहज धर्म बन जाता है! ईसाई मिशनरियां इसी लिए भारत की गरीबी और जनता की बदअकली और भोलेपन का लाभ उठाती है !
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ऐसी स्तिथि में हम क्या कर रहे हैं और सरकारें क्या कर रही हैं ??
सरकारें ?? … अरे साहब सरकारों को छोड़ दीजिये … ये तो इस दलदल को निरंतर बढ़ाने का काम कर रही है !!
लेकिन हम क्या कर रहे हैं ??
क्या हम दीनू मांझी और शिबू मांझी को जेवियर मुर्मू और माइकल मुर्मू के समकक्ष खड़ा नहीं कर सकते ??
यकीन मानिए जिस दिन ये होने लगा …. मिशनरियां लहंगा उठा के दौड़ती भागती नज़र आएगी।
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गंगा महतो
खोपोली।