Saturday, September 17, 2016

||ऑटोमोबाइल का दुःख||

पहले हमारे घरों में (शायद अब भी) एक फोटो बहुत कॉमन हुआ करती थी वो यमराज वाली जिसमें पृथ्वी लोक में किये गए कुकर्मों का यमलोक में दिए जाने वाले दंडों का सचित्र वर्णन होता था।। … जैसे कोई यहाँ मृत्युलोक में बैलगाड़ी में ज्यादा वजन ले के बैल के न खींच पाने पे उसको मारता है तो यमलोक में उसके हाथ काट के उसको गाड़ी में बाँध कर ढेर सारा वजन ले यमदूत द्वारा चाबुक से मारते हुए दिखाया जाता था … जो यहाँ कसाई का काम करता है उसको वहाँ बड़का आरी से चीरते हुए दिखाया जाता था.. जो यहाँ तराजू में डंडी मारता है उसको वहाँ उल्टा करके आग के ऊपर लटकाया जाता था.. और ऐसे ही..  मने जो यहाँ जैसा कुकर्म करता है उसको यमलोक में उसी के माफ़िक़ और उससे भी अधिक भयंकर दंड दिया जाता है।… तो मैं जब भी ऐसा कोई दृश्य देखता था जो उन फोटुओं से मेल खाता था तो मैं सामने जा के उस आदमी से बोल देता था कि भैया मालुम है आपके इस काम के लिए यमराज जी ने कौन से सजा का प्रावधान किया हुआ है!?... और मैं बोल के निकल लेता।

तो क्या है कि मेरा इंजीनियर मन भी इस तरह का जब कोई दृश्य देखता है तो वो फोटू सब याद आने लगते हैं.. कि यार मशीनों पे भी कितने जुल्म होते हैं.. क्या इसके लिए कोई सज़ा-वज़ा नहीं!?..
तो क्या हुआ कि एक दिन मैं सपना देखने लगा .. कुछ इस तरह का सपना…
जितने भी ऑटोमोबाइल वेहिकल्स हैं न वो विश्वकर्मा जी के द्वार के सामने फरियाद लगा रहे हैं…
“प्रभु त्राहिमाम… त्राहिमाम.. त्राहिमाम… !!”
विश्वकर्मा जी हैरान परेशान हो गाड़ियों के हुजूम के सामने आते है और बोलते है..
“अरे शांत हो जाइये.. शांत हो जाइये… क्या समस्या है आपलोगों की वो बताइये.. !!”
वर्ल्ड ऑटोमोबाइल एसोसिएशन के अध्यक्ष ट्रक महोदय आगे आते है बोलते है.. 
“प्रभु! .. यमराज जी ने तो सभी प्रकार के दंड निर्धारित किये हैं मनुष्यों के ऊपर… कि जो मनुष्य जिस तरह का जुल्म करेगा, पाप करेगा उसको उसी के अनुपात में यमलोक में दंड मिलेगा… लेकिन हमलोग के ऊपर जो जुल्म होता है उसका दंड तो आपने निर्धारित किया ही नहीं… बल्कि कभी विचार किया ही नहीं… या आपने कभी ध्यान दिया ही नहीं.. हमलोगों के ऊपर भी बहुत जुल्म होता है भगवन.. बल्कि लगातार हो रहा हैं... बहुत सताया जा रहा हैं हमें.. जब मनुष्यों द्वारा दूसरों को सताये जाने पे दंड का प्रावधान हैं तो फिर हमलोगों के ऊपर होने वाले जुल्म का हिसाब-किताब क्यों नहीं? ..तो  हम तमाम ऑटोमोबाइल संघ वाले चाहते कि हमारे भी ऊपर होने वाले जुल्म का हिसाब-किताब रखा जाय और उसी अनुपात में यहाँ दंड दिया जाय.. एक कानून बनाया जाय जिससे हमलोगों के ऊपर कोई जुल्म करें तो मन में ये संतोष रहेगा कि विश्वकर्मा जी आपको इस जुल्म के लिए दण्डित करेंगे।.. उन्हें दंड मिलना ही मिलना चाहिए।“
तमाम संघ सदस्य पे-पे,पी-पी, पो-पो,भ्रुम्म्-भ्रुम्म्,हड़-हड़-हड़,हुड़-हुड़-हुड़ के आवाज के साथ अपने अध्यक्ष की बात का समर्थन करते हैं “हाँ.. हाँ.. दंड मिलना चाहिए.. मिलना चाहिए।“.
विश्वकर्मा जी “ अच्छा ठीक है ठीक है.. पहले आपलोग शांत हो जाइए.. शांत हो जाइए.. अपने होरन और एक्सेलेटर को कम कीजिये और एक-एक करके अपनी समस्या रखिये!..और  बुलेट महाराज आप तो पूरी तरह से बन्द ही हो जाइए।”.
सबसे पहले ट्रेक्टर महाराज आये और अपनी बात रखने लगे..
“ प्रभु .. बहुत जुल्म होता है हमरे ऊपर.. जितना हमरे डाला की केपेसिटी नहीं होती है उससे जादा वजन लोड कर देते हैं.. और न खींच पाने की स्तिथि में ये मनुष्य इतना एक्सेलेटर दबाते है कि क्या कहे.. पूरा नट-बोल्ट हिलने लगता है.. जादा लोड के कारण मेरा मुंडी ऊपरकड़ाही उठने लगता है प्रभु.. ऐसा लगने लगता है जैसे हमको फाँसी पे टाँग दिया हो.. इतने में ही न मानते हैं ससुर लोग.. दो-चार आदमी आ के हमरी मुंडी में चढ़ जाते हैं.. और फिर ले एक्सेलेटर दबाना.. पूरा झनझनाय जाते है प्रभु.. और कभी दलदल वाले जगह में फंस गए तो ससुरे हमारे टायर के नीचे ऐसे-ऐसे नुकीले पत्थर-ईंटें और लकड़ियाँ डालते हैं कि क्या कहे.. मेरा सुंदर सा MRF टायर छिलने-कटने लगता है प्रभु.. जालिम लोग इसके भी ऊपर जोर-जोर से एक्सेलेटर दबा-दबा के मेरा चक्का और जोर-जोर से घुमाते है… इतना जोर से चक्का रोनिंग कराते है कि क्या कहे प्रभु..  बहुत तकलीफ होता है प्रभु.. इनलोगों को भी कुछ इसी तरह से दंड मिलना चाहिए प्रभु।“
अब सरकारी बस का मुखिया आगे आया और बोलने लगा, “ प्रभु हमारी तो पूछिये ही मत.. लगता है कि हमलोगों का जन्म केवल दंगों और हड़तालों में केवल तोड़ने, फोड़ने और जलाने के लिए ही होता हैं.. हमारी टायरें धूं-धूं करके एकदम से धड़ाम से फट जाती है.. ऐसे जलाते है प्रभु कि क्या बताये… उन सालों को यहाँ भी जला-जला के मारिये.. उनकी जब अपनी फटेगी न तब पता चलेगा कि टायर फटने का दर्द क्या होता है!?”.
अब 100 CC  वालों का सरदार स्प्लेंडर आया और अपना दुखड़ा सुनाने लगा, “अब हम का बताये प्रभु.. हम तो मिडिल क्लास वालों के मीडियम रेंज वाले गाड़ी हैं.. लेकिन कुछ ऐसे लौंडे होते हैं जो हमें इस तरह से तड़पाते है कि जैसे हम 200 CC वाले गाड़ी हो… अरे हम कहाँ टक्कर दे पाएंगे 200 CC वालों को .. लेकिन नहीं.. हमें भगाएंगे साले.. फुल एक्सेलेटर में भगाएंगे.. पूरा इंजीन झनझनाय जाता है प्रभु..  ऐसा लगने लगता है कि अब तब ‘गडजियोन’ पिन खुल के फेंकाय जाएगा.. इंजीनवा अइसन धीप जाता है कि क्या कहे प्रभु…. हमें 100 CC का गाड़ी समझ के कोई चलेबे नहीं करता है प्रभु.. इन्हें दंड दीजिये प्रभु .. दंड दीजिए।“
तो वहीँ 150-250 CC वालों का मुखिया पल्सर आता है अपनी व्यथा सुनाता है, “प्रभु स्प्लेंडर भाई ने तो अपनी व्यथा सुना दी.. लेकिन हम भी कम सताये हुए नहीं है.. सारहे लोग मेरा कान (एक्सेलेटर) इस तरह से मोचरते है कि क्या कहे.. जमीन पे लेटा के इस तरह से घुमाते हुए 8 और S लिखते है कि क्या कहे.. टायरवा से धुंआ फेंकने लगता है प्रभु.. एक्सेलेटर और क्लच कुछ इस तरह से ले के छोड़ते है कि मेरा मुंडी एकबैगे से उठ जाता है.. मेरी क्लच प्लेट की वाट लगा के रख देते हैं.. और अगर पीछे कोई गर्लफ्रेंड बैठ गई तो मेरी तो खैर ही नहीं.. बस उस हम टाइम आपसे यही प्रार्थना करते है कि विश्वकर्मा जी ये आदमी मुझे किसी ट्रक या वैन में जा के ठोक न दे! .. ऐसे लोगों का दंड का विधान होना चाहिए प्रभु.. होना चाहिए।“
तो अबकी बार स्कुटियों की प्रवक्ता एक्टिवा शर्माते हुए आती है और बोलती है, “हमलोगों की हालत के तो क्या कहने प्रभु! .. घर से अगर मालिक के साथ निकले तो कोई समस्या नहीं.. लेकिन जैसे मालकिन के साथ निकले तो क्या बताये.. प्लेटिना,स्प्लेंडर से ले के पल्सर और बुलेट वाले तक पीछू पड़ जाते हैं.. पी-पा-पो, ध्रुम्म-भ्रुम्म की आवाज़ों के साथ हमें छेड़ने लगते हैं.. कभी-कभी एकदम सामने आ के चिंगोटी भी काट के निकल लेते हैं.. तो कभी-कभी हमारी प्यारी सी इंडिकेटर को फोड़ डालते हैं.. बाहर निकलने में हमें बहुत डर लगता है प्रभु.. ऐसे खुले-आम छेड़खानी करने वालों को कठोर से कठोर दंड दीजिये प्रभु।“

तो अब बूढ़े हो चुके गाड़ियों के सरदार ‘राजदूत’ जी आते है और अपनी कंपकंपाती आवाज में अपनी व्यथा सुनाने लगते हैं, “हमारी तो पूछिये ही मत प्रभु.. हम जब जवान थे तो पांच-पांच गो आदमी बैठ जाता था हमारे ऊपर.. और अब बुढ़ाय गए है तो ससुर लोग ठीक से खाना भी नहीं खिलाते और और बहुत ही आलतू-फ़ालतू कार्यों में लगा देते हैं.. जरल मोबिल डाल के और पेट्रोल की जगह केरोसिन डाल के हमसे काम लिया जाता है प्रभु.. मेरे साइलेंसर से ऐसे धुँआ निकलता है जैसे हम धरती के सुईया जहाज है.. एक तो हमारे पिस्टन और सिलिंडर का पहले से ही वियर एंड टियर की लगी रहती है.. लेकिन जालिम लोग फिर भी रहम नहीं करते है और जरल मोबिल और केरोसिन डाल के मेरी और वाट लगाते रहते है… इन ससुरों की ऐसी वाट ऐसी वाट लगाइये प्रभु कि कोई भी हम जैसे बुजुर्ग गाड़ियों के ऊपर जुल्म करने से पहले हज़ार बार सोचे।“

जितनी गाड़ियां उतनी व्यथा और फ़रियाद.. ट्रक महोदय आगे आ के सबको शांत कराते है और विश्वकर्मा जी से बोलते है, “प्रभु आज तो आपका दिवस है.. प्लीज़ हमारे ऊपर भी होने वाले जुल्मों का हिसाब-किताब लिया जाय.. आखिर हैं तो हम आपकी कृति ही न.. और आपकी कृति के साथ कोई जुल्म करें तो कैसे बर्दाश्त करेंगे आप.. ब्रह्मा जी के कृति के ऊपर यमराज जी दंड तय करते है.. तो आप भी अपनी कृति के ऊपर होने वाले जुल्म, अन्याय और पाप का हिसाब-किताब क्यों न कीजियेगा प्रभु.. हम तमाम संघ वालों का आपसे यही प्रार्थना है कि हमारी फरियाद सुने और इसपे विचार करें और जल्दी ही एक दंड-संहिता का निर्माण करें।“
विश्वकर्मा जी ने सबकी बात को बड़े ध्यान और गौर के साथ सुना और उसके बाद सभी संघ वालों को संबोधित करते हुए कहने लगे..
“हमने आप सभी की बातों को बड़े ध्यान से सुना.. वाक़ई में आपकी माँगे और फरियाद जायज हैं.. आपके ऊपर मनुष्य बहुत जुल्म कर रहे हैं.. और निरन्तर कर रहे हैं.. और उसके लिए इन्हें दंड देना अनिवार्य हैं.. हम जल्द ही चित्रगुप्त और यमराज महाराज के साथ इस विषय पे चर्चा करने वाले हैं, और उसके बाद चित्रगुप्त की अध्यक्षता में एक ड्राफ्टिंग कमेटी का निर्माण करने वाले हैं, जो आपके ऊपर होने वाले जुल्मों के अनुरूप चित्रगुप्त जी अलग से दंड का विधान रखेंगे.. और आपके ऊपर होने वाले जुल्मों का मनुष्य के पाप के खाते में अतिरिक्त ऐड किया जाएगा.. और मैं आप सबों को आश्वस्त करता हूँ कि ये काम बहुत जल्द ही पूरा कर लिया जाएगा.. अब आपलोग जाइए.. आपके ऊपर होने वाले एक-एक पाप का यहाँ बराबर हिसाब लिया जाएगा।“

इतने में ही हमारी नींद खुल जाती है.. और मैं बस यही सोचने बैठ जाता हूँ कि गाड़ियों के ऊपर होने वाले जुल्म के ऊपर चित्रगुप्त महाराज की ‘ड्राफ्टिंग कमेटी’ किस-किस तरह के सज़ा का प्रावधान कर रहे होंगे।
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मिस्त्री गंगवा
खोपोली वाला। :)

Saturday, September 10, 2016

||कर्मा परब ||

||कर्मा परब ||

सावन बीत गया है.. अपनी झमझमाती बरखा की बौछारों से ताल-तलैयों को सराबोर करते हुए चहुंओर हरियाली का सौगात दे गई है.. प्रकृति बोल पड़ी है। ..अभी  भादो का महीना चल रहा है.. खेतों में धान लहलहा रही हैं.. ठेरका और घंटियों की आवाज़ और चरवाहों के हाँकों के बीच गाय-गोरु पुरे मगन के साथ चर रही हैं.. तो कुछ खुले और छूटे टाइप के बाछा बाड़े से भागकर खेत में लगी धान की दावत उड़ा रहे हैं, तो कुछ घंटों के बाद खेत मालकिन/मालिक उन बाछों को खदेड़ते हुए बाछा मालिक के पुरे खानदान की कुंडली निकालते हुए उनके घरों में घुसा दे रहे हैं.. और फिर अगले दिन से उस बाछे में गर्दन में बड़ा सा ठेरका या फिर लठ बाँध दिया जा रहा है।.. खेतों में धान के पौधों के साथ खरपतवार भी उग आये है.. डेढ़-दो महीने पहले ब्याह कर ससुराल आई नई बहुएं अपनी सासु माँ के संग खेतों में खरपतवार को निका रही है.. किसी खेत में ‘बोकी’ लग गया है तो कीटनाशक का छिड़काव किया जा रहा है..। .. भादो का महीना है.. कभी इतनी जोर से बारिश तो कभी इतनी तेज धूप और उमस की क्या कहने.. एक पल चादर ओढ़ने को मन करता तो दूजे पल सब कुछ उतार फेंक देने को... घर में रखा नून और गुड़ पिघल रहा है.. घरजवाई का ससुराल में टिकने का हिम्मत नहीं हो रहा है.. तबे तो ये कहावत बनी “भादोक गर्मी में घरजवाँय भागल हलेय!”। तो वहीँ नवविवाहितों का प्रेम अपने चरम में हैं। लेकिन इन्हीं गहन प्रेम के बीच नवविवाहिता का मन ससुराल में नहीं लग रहा है, बरबस ही उनका मन नईहर की ओर खींचा चला जा रहा है, क्योंकि “कर्मा परब” जो आने वाला है। नवविवाहिता अपने पति को न कह के अपने देवर से कहती है ..
“ आय गेलय भादर मास
 लाइग गेलक नईहरक आस 2
छोटो देउरा हो.. कह दिहक ददा के तोहाइर
करम खेले जाइब नईहर।“
जी हाँ, झारखण्डी जनमानस की प्रकृतिरूपा ममत्वप्रिया कन्या झंकृत हो उठी है.. झारखण्ड के भूमण्डल में ‘कर्मा परब’ की आहट सुनाई पड़ने लगी है.. नवविवाहिताएं नईहर जाने को आतुर है.. बेसब्री से अपने भाइयों का लियान के लिए इंतज़ार कर रही हैं.. वहीँ नईहर में इनकी छोटी बहनें अपनी दीदियों का। सब मिल के एक साथ में पाँतवार हो के कदमताल के साथ ‘जावा’ नाचने के लिए लालायित हो उठी है. .. अखाड़े की साफ़-सफाई और चाक-चौबंध का पूरा प्रबन्ध किया जा रहा है।
भाद्र मास के शुक्ल पक्ष के एकादशी के दिन ‘कर्मा परब’ मनाया जाता है। एकादशी के ठीक सात या फिर नौ दिन पहले नवयुवतियां पास के बाँध या फिर नदी में स्नान कर करम डाली में सात या नौ प्रकार के दलहन या शस्यबीज ( धान, कुरथी,मुंग,बिरही,घँघरा,गेहूँ,चना,मकई और सेम) का नेगविधि से रोपन करती है जिसे ‘जावा उठाना’ कहते है। और साथ ही साथ सब कोई अपना निजी जावा भी ‘टुपला’ में उठाती है। मुख्य जावा डाली के साथ अन्य जावा को अखाड़ा में रख कर सात/नौ दिन युवतियां ‘करम गोसाई’ की गीतों के माध्यम से नृत्य करते हुए आराधना करती है।.. पूरा वातावरण संगीतमय हो उठता है… सुबह और देर रात तक युवतियां आखरा में नृत्य करती है..
“छोटे मोटे उड़ेन फेरवा
 मुठिएक डाइढ़ गो
 ताही तरे सुरुजा देवा
 खेला ले जावाञ।“
 "जाउआ माञ जाउआ, किआ किआ जाउआ..
 जाउलँ भाइरे कुरथि बहुला"!
जैसे गीतों से पूरी प्रकृति झंकृत हो उठती है। करम गोसाई से अच्छे फसल की उपज के लिए कामना किया जाता है।
कर्मा की नृत्य-शैली एक अलग किसिम की होती है। माना जाता है कि करम-नाच से उत्पन्न शारीरिक प्रक्रिया से नवयुवतियों में मातृत्व शक्ति की वृद्धि होती है, बांझपन की समस्या नहीं होती है एवम् प्रसव सुगमतापूर्वक व खतरा रहित होता है।
कर्मा परब भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का परब है.. भाई-बहन के रिश्ते को और भी प्रगाढ़ता प्रदान करता है.. भाई बहन के रक्षा के धर्म के प्रति कृत-संकल्प होता है. इसलिए कहा जाता है “बहिनेक करम, भायेक धरम”. . बहनें अपने भाईयों के दीर्घायु होने का कामना करते हुए गाती है,
"देहु देहु करम गसाञ, देहु आसिस रे
भइआ मरअ बाढ़तअ लाखअ बरिस रे।
देबो जे कर्मति देबो आसिस रे
भइया तोर बढ़तउ लाखों बरिस रे।“
मेरी छुटकी ने दस दिन पहले ही फोन करके बोल दी थी ‘दादा .. इस बार के कर्मा के साड़ी का बजट पिछले साल से दुगुना रहेगा.. आप नहीं आ रहे है तो ये आपकी सज़ा है!”
मेरी छुटकी तुम दोगुना क्या चार गुना पाँच गुना ज्यादा महँगा साड़ी खरीदना.. खेद है बहन नहीं आ पा रहा हूँ इस कर्मा में।
पूरा झारखण्ड कर्मा के रंग में रंगा हुआ है.. कर्मा के गीतों के साथ पूरी प्रकृति झूम रही हैं.. धान की बालियां फूटने को आतुर है। कल एकादशी है .. सभी आखरा में करम वृक्ष की डाली गाड़कर करम गोसाई की पुरे नेगाचारि और विधि-विधान के साथ पूजा होगी। मांदर की मधुरमय थापों के साथ झूमर गान होगा.. पूरी रात जागरण होगा।
करम गोसाई से प्रार्थना है कि इस साल भी फसल की उपज अच्छी हो और बहनों की सारी मनोकामनाएं परिपूर्ण हो।
सभी कर्मा परबेतिन के साथ-साथ समस्त झारखण्ड वासियों को कर्मा परब की बहुत-बहुत शुभकामनायें।
जय करम गोसाइ।
जय झारखण्ड
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गंगा महतो
खोपोली।


Saturday, August 20, 2016

||रमेसरा कर लभ लेटर||


मोर करेजा के टुकड़ा
स्वीट हार्ट कोलेसरी,
                                💘💘

       “लिख रहा हूँ खत खून से स्याही का मत समझना,
        बौराया हूँ सिर्फ तुमरे पियार में जमाने का मत समझना।“

बहुते मुश्किल से ई पेन आर कॉपी उठाये है तुमको लेटर लिखने के लिए। जिया धकधकाय रहा है, हथवा हड़बडाय रहा है, हैण्डराइटिंग ठीक से बैठ रहा नहीं रहा है, पहली बार जो लिख रहे है न, तो तनी माफ़ कर देना गोल-गोल लिखाय नहीं रहा है, मकिन हमर जज़्बात एकदम गोल-गोल आर ठोस है।
पहले तोर गाँवा के परसा गजरवा धारी खाली संझिया बेरा घरी मिलना हमरा एकदम से झनझनाय देता था.. लेकिन सिर्फ एक टेम ही मिल पाते थे, उ भी डरे-डरे आर जादा टेम खातिर नाय, मन नहीं भर पाता था, फिर हम सगर घरी तोरे याद में एकदम पगलेट जइसन घुरले चलते थे.. सगर घण्टी बस तोरे से बतियाने का मन करता रहता था.. तब हम बस तोर से बात करे के खातिर कारीपानी से हड़बड़ाहा सैकला ले के बत्तीस दिन लगातार कोयला ढोये थे और कोयला डीपू में कोयला बेचे के दू गो इंटेक्स का एंड्राइड वाला मोबाइल खरीदे थे, एक ठो तुमको दिए थे और एगो हम खुद रखे थे.. और तब से हम तुमसे पेट भर के बतियाते थे, फेसबुक वाट्सअप में डूबल रहते थे.. लेकिन का कहे पिछले तीन दिन से साला ई जो लैनिया कटा है सो अईबे नहीं किया है.. मोबाइलवा नरसुवे राती तुमसे जो लभ जू कहने के बाद जो बन्द हुआ है सो अब तक भी मरा हुआ है.. जिया एकदम बसतल लकड़ी जइसन धुंवाय रहा है.. पेट के भात नहीं पच रहा है.. लग रहा है कि डीभीसी का प्लांट जाय आर साला उसका प्लांटवे बम से उड़ाय दे.. साला हमनी के कोयला-धोयला आर हमनिए के बिजली नाय!!.. रे कोलेसरी हमर-तोर प्यार के दुश्मन खाली तोर भईवा आर बप्पे नाय हो मकिन ई डीभीसी वाला सब भी हथुन। .. मोबाइलवा चर्जरवा में ठूस के रखले है कि कखनो लैन आय और जरिको सा भी चारज हो जाय और तुमसे तनी गुटरगूँ कर ले।। से खातिर आज हम लेटर लिखने बैठ गए.. और ई लेटर हम आपन दूफेड़ी महुआ गछे चढ़ के लिख रहे है. इसे तुम अपने दिल का महुआ गाछ समझना।
“तोरे प्यार में रे कोलेसरी
कभी फुसरो तो कभी ईसरी
कभी बालूशाही तो कभी मिसरी
कभी कदम,महुआ तो कभी पचरी।“

अब जब हम लेटर लिखिए रहे है तो हम पहिलका भेंट का जिक्र करेंगे जब तुम हमरा दिल चोराय के जोभी खेत में गाड़ दी थी।.. हमर मोसियाइत ददा के बिहा में जब तुम भौजी का लोकदिन बन के बरमाला के स्टेज पे आई थी.. तोरा देखते ही ‘दिला मोरा हुबुक-डुबुक करे न रे, दिला हुबुक-डुबुक करे न’ करने लगा था।.. ललका टॉप और करिका जीन्स में तुम एकदम ‘भेलवा’ जइसन लग रही थी।.. गाल एकदम अइसन जैसे ऐरसा रोटी, आईख के लपकी-झपकी अइसन कि जैसे बस-पहरी के बोन, दाँत अइसन कि जैसे तेतेर के पात आर चमको हलो अइसन कि जैसे पोठी माछ.. होंठ अइसन जैसे सुगा के ठोर, नाक अइसन तीख जइसन पारसनाथ के चोटी, बाल अइसन करिया जइसन कारीपानी के कोयला, बोली तोर अइसन जैसे विविध-भारती से टरेनिंग ले के लौटी हो.. चाल अइसन जैसे बहियार खेत में लहलहाती धानों का हवाओं के साथ मचलना। कुल मिलाय के करिश्मा कपूर से भी जादे लग रही थी… देख के तो हम आउट ऑफ़ कण्ट्रोल हो गए थे.. दू डिब्बा स्प्रे हम तो केवल तुमरे ऊपर छुस-छुसाय दिए थे… “मोर दिला के केर लेले चोरी गे” के गाने ऊपर हम साढ़े पचहत्तर बार एकदम से घोलट-घोलट के डांस किये थे, क्योंकि छिहत्तरवें बार में तुमरा भाई आ के लड़ाई कर दिया था।
तुमको याद है रे कोलेसरी जब हम तुमसे पहली बार बोले थे “हेल्लो मैडम.. हू आर यू!” .. तो तुमने क्या बोला था ?
“छोड़ा ई सैंडिल्या देखो ही रे, कपारे अइसन मारबो ने कि सीधा गोदिया तक चेल जीतो”.
क़सम से उ सैंडिल्या वाला बात कपार के गोदी में तो नहीं घुसा लेकिन हमर दिल में अइसन घुसा जैसे नेटी मछरी कादो में दनदनाइल घुस जाती है।.. तखने हम बूढ़ा माँझी से प्रार्थना किये थे कि “हे बूढ़ा माँझी.. यदि कोलेसरी हमसे प्यार से बात करने लगी न तो हम तोरा के लाल बंगवा मुर्गा काटेंगे”. .. और बूढ़ा माँझी ने हमारी बात सुनी जब घूरा-फिरी के टाइम भौजी के कहने तुम हमको बोली थी “हाय रामेसर, कैसे हो?” .. क़सम से क्या बताये क्या ख़ुशी मिली थी हमको, सौभाग्य से उ दिन शनिवारे था, दौड़ते हुए घर आये थे और ललका मुर्गवा को दौड़ा-दौड़ा के पकड़े थे और बूढ़ा माँझी के यहाँ काट के आये थे। .. लगले हाथ द्वेरसिनी मैया से भी प्रार्थना कर दिए थे कि “हे द्वेरसिनी मैया जदि कोलेसरी हमसे प्यार करने लगी न तो तोहरे द्वार में हम भेड़ा काटेंगे”. .. और हमरी प्रार्थना द्वेरसिनी मैया ने भी सुन ली जब हम चौथे मिलन में ही तुमसे प्यार का इज़हार किए थे और तुमने एकदम ऐश्वर्या राय टेप में शरमाते हुए एक्सेप्ट किया था।.. उ हमर जिनगी के सबसे बेस्ट पल था रे कोलेसरी।
कोलेसरी आज हम एक बात बताते है जो कि हम तुमसे छुपाये है.. मालुम है उस दिन जब तुम हमको फोन करके बुलाई थी मिलने अपने छत के ऊपर.. हम गए थे.. हम दीवार में लगे ईंट के जेन से लटक-लटक के ऊपर चढ़ ही रहे थे कि तबे पता नहीं तुमरा बप्पा कहाँ से आ टपका, हमरा चेहरा तो नहीं देख पाये थे बाकी उजरका शर्टवा से देख लिए कि कोई छत पे चढ़ रहा है.. हल्ला करके आपन पोसलहा कटवा कुकुर को मेरे पीछे दौड़ा दिए थे.. मैं आधे दीवार से ही नीचे कूद गया था, मेरा गोड़वा मोमड़ाय गया था, किसी तरह उठे और जो भागे थे कि क्या बताये.. अरे उ कुकरा तो हमको अटाये लेता लेकिन हम भी हाई इस्कूल में दौड़े में फस्ट प्राइज जीते है, कुकरा को तो कहीं सटने नहीं दिए थे, कुकरा तो गाँव के सीमा के बाहर नहीं आया लेकिन हाय रे मेरी किस्मत, मैं दौड़ते हुए पीछे मुड़-मुड़ के देख रहा था कि कोई आ तो नहीं रहा, एतने में ही एगो गढ़ा में हम हड़ास से तुबाय गए, गोड़वा के सुपलिया एकदम से घूर गया.. माय क़सम हम हुवे गोड़ पकेड़ बैठे रहे आधा घण्टा, फिर कोनो नियर लेंगेले-लेंगेले घर आये थे.. काकू के दोकना से अमिता बच्चन वाला मूव क्रीम लाये थे और पूरा घस-घस के लगाए थे, लेकिन साला कोनो आराम नहीं मिला था.. फिर गाँवा के एक वैध से सोटवाये थे चार बोतल महुआ दे के।.. माय क़सम तोर बप्पा कोनो अमरिस पूरी से कम नाय हो।
और एक बात बताते है… जब तुम मेट्रिक का परीक्षा दे रही थी न तब हम तुमको दुसरका मंजिलवा में पाइप पकड़-पकड़ के चढ़ते थे और चुटका पहुँचाते थे.. एक बेर साला पुलिस वाला सब आ गया, हम पहिलका मंजिलवा के खिड़किया तक चढ़े थे.. हमका ऐकबगै पुलिस देख के तो अकबकी छुट गया.. हम वहँ से छलाँग मार के कूदे और दौड़ने लगे.. पुलिस वाला बड़का मोटा रूल ले के ओहे कुकरे के माफ़िक़ हमरे पीछू दौड़ा था.. बोला रुक..रुक… लेकिन हम कहाँ रुकने वाले थे.. साला उ पुलिस वाला आपन रूल अइसन झबेद के मारा था कि पूरा का पूरा रूल मेरा पिछवनिया में आ के सट गया था.. माय क़सम का बताये .. पूरा उथेल गया था.. घर आय के आपने हाथ से कोनो नियर कड़ुआ तेल आर छेछल प्याज़ को गरम कर-कर के सेंके थे। और फिर दूसरे दिन तुमरे चुटका पहुँचाने खातिर हाज़िर थे।
माय क़सम जब हम अपना मोबाइल में देखे कि तुमरा 85 परसेंट आया है तो मारे ख़ुशी के पगलाय गए थे.. घर के बीटा से महुआ निकाल के बेचे थे और पुरे गाँव में पेड़ा बाँटे थे और सभिन दोस्त सब के बियर पिलाये थे।
अबकी बार इंटर में तनिक मन लगा के पढ़ो नहीं तो खैर हम हइये है शक्तिमान जइसन चुटका पहुँचावे में माहिर, मकिन 80 परसेंट से कम नहीं लाना है।
अहे बतिया में हम तोरा के सतीश दास के एक गाना समर्पित करते है..
“एते सुंदर मुखड़ा देखाय हे झक्कास,
तोरे संगे करबो बिहा देखो हियो आस,
कोलेसरी कहिया करबी गे~~ तोय इंटर पास।“
बाकी हम रजरप्पा के काली मैया के यहाँ जोड़ा-पाठा गछ दिए है तुमसे बिहा करे के खातिर.. और बूढ़ा माँझी और द्वेरसिनी मैया के जइसन ही रजरप्पा माई भी हमको निराश नहीं करेगी। .. बिहा में हम सतीश दास आर बंटी सिंह के आर्केस्ट्रा भी मंगायेंगे.. ददा-भौजी को सब बात बताय दिए है.. बाकी तुम जल्दी से इंटर पास हो जाव।
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और अब हम का बताये, यहाँ महुआ के पेड़ में FM बाजा चला के तुमको लेटर लिख रहे है, नीचे महुआ गिर गया है, अब बिछने नीचे उतर रहे है, काहे कि अहे महुआ है जो हमारा-तुम्हारा नाईट पैक और इंटरनेट का रिचार्ज करवाता है।.. बस महुआ के फूल के रस के जइसन हमनी के प्यार के मिठास बनल रहे।
लास्ट में तोर खातिर मनोज देहाती के गाना प्रस्तुत हो,
“तोय हमर दिल लागे तोय हमर जान लागे,
काली मैया ठिने कोलेसरी तोय माँगल लागे,
हमे पागल भे जिबो गे, हम तोर बिना मर जिबो गे।“
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बस अहे कामना के साथ
भेरी भेरी I 💘💘💘 You कोलेसरी

तोर बौराहा
रामेसर।
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गंगवा
खोपोली।

Saturday, August 13, 2016

||बम्बई||

बम्बई नगरी ! ... ये शब्द ही बहुत कुछ कहती है … कितने किताब, उपन्यास,नाटक,फ़िल्म इसपे बन चुके हैं.. बन रहे हैं.. रोज दसियों पत्र-पत्रिकाएं और अखबार छपते हैं इसके नाम से.. भारत की आर्थिक राजधानी! … कुछ दिन पहले यूट्यूब पे एक वीडियो देख रहा था.. उसमें एक जन अमेरिका में अमेरिकियों से पूछता है कि “यदि मैं इंडिया बोलूँ तो सबसे पहले आपके मन में क्या आता है ?” .. तो अधिकतर के ज़वाब थे “ इंडिया मने ताजमहल” ..  फिर था “इंडिया मने बॉलीवूड” फिर था “इंडिया मने स्लम्स” तो कुछेक के ज़वाब थे यहाँ के ‘मसालेदार खाना’! .. खैर विदेशियों के मन में भारत मने बॉलीवुड .. वहीँ अगर हम भारतीयों की बात करे तो महाराष्ट्र मने मुम्बई और मुम्बई मने बॉलीवुड!! और बॉलीवुड के कारण आमची चमचमाती मुम्बई! .. मुम्बई को जितना जाना था वो केवल किस्से-कहानियों, फिल्मों और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से ही। .. गाँव में जब भी कोई बम्बईया हीरो आता था न तो हम उसको घेर के बैठ जाते थे.. और फिर जो वो लम्बी-लम्बी फेंकता था, उसमें हम बस बहते चले जाते थे।.. उसकी बातों को इतनी तल्लीनता से सुनते कि उसके शब्दों के साथ-साथ में मुम्बई में प्रविष्ट में जाते थे और बस यही चाहते थे कि तुम बस सुनाते जाओ सुनाते जाओ बम्बई की कहानियाँ और हम बम्बई से बाहर निकले ही नहीं। हीरो-हीरोईन की बातों का तो क्या कहना.. खोद-खोद के पूछते थे..और वो भी तेल मसाले कम नहीं लगाते थे .. बम्बईया हीरो सब का चाल-चलन, पहनावा और बोली अन्य लड़कों से अलग कर देती थी.. लड़कियां चुम्बक की भांति खींची चली आती उसकी तरफ.. तो हमरे मन में भी यही ख्याल आता था कि साला हम कब जाये बम्बई ? .. खैर तब तो हम न आ पाये.. गाँव से पहली बार बाहर निकले तो हजारीबाग के लिए। फिर बोकारो.. कुछ दिन राँची और फिर उसके बाद नागपुर। .. जब भी नागपुर से गाँव जाता तो सब यही पूछते ‘बम्बई से कब आया.. कुछ सुनाओ बम्बई के बारे में !’ .. फिर हम समझाते ‘अरे हम बम्बई में नहीं रहते है.. नागपुर में रहते है.. बम्बई बहुत दूर है नागपुर से।‘ .. लेकिन मन में था कि कभी बम्बई भी जाये।.. खैर ये कामना पूरी हुई.. आज से यही ठीक चार साल पहले.. अगस्त 2012 .. जब हम मुम्बई में कदम रखे.. अकेले आये थे.. कोई आईडिया नहीं था इस शहर के बारे में.. बस भूषण स्टील के कुछ जनों का कॉन्टेक्ट नम्बर था.. हालाँकि मेरे गाँव के बहुत सारे बम्बईया हीरो रहते थे लेकिन किसी का नम्बर नहीं था।.. शाम-शाम को उतरे रहे दादर स्टेशन में।.. जैसे ही ट्रेन से बाहर आया , रे बाबा !!! .. इत्ता भीड़ !! .. माय कसम एतना भीड़ तो हम भेण्डरा मेला में भी नहीं देखे थे.. पहली बार इस तरह की भीड़ से पाला पड़ा था।.. ले दन दन दन चले पड़े हैं.. किसी के पास कोई टाइम नहीं… सब जल्दी में हैं.. इतने में कोई लॉकल आती है दूसरे प्लेटफॉर्म पे… ले धड़ धड़ धड़.. धप धप धप करते दौड़ते लोग.. लगा कि साला कहीं ब्रीजे न टूट जाय!.. मुझे दो-तीन जन धक्के मारते हुए पास हुए.. मैं बड़ी मुश्किल से किनारे पे आया।.. यहाँ पे एक अजीब सा देखा.. लोग अमूमन बैग पीठ पे ले के चलते हैं लेकिन यहाँ बैग को छाती और पेट के बल पे ले के चलते हैं।.. किसी से कुछ पूछो तो जल्दी-जल्दी में ही क्या-क्या बोलता कुछ पल्ले ही पड़ता.. मैं ऑवरब्रिज में खड़ा ही था कि भैया का फोन आया ..
“अरे पहुँच गया ?”
“हाँ दा.. अभी जस्ट उतरे है”
“कहाँ हो अभी ?”
“दादर में”
“अभी खोपोली को निकलोगे कि कहाँ रहोगे ?”
“नहीं अब अभी नहीं निकलूंगा.. यहीं कहीं होटल में रुक लूंगा।“
“अरे होटल में काहे रुकेगा ! … गोरेगांव में बड़का दादा (मौसी का लड़का) रहता है.. वहीँ पे चले जाओ.. दादर से 20-25 मिनट लगता है लोकल से!”
“ठीक है.. फिर उनका नम्बर दे दीजिये”
भैया नम्बर देते है.. मैं फोन लगाता हूँ.. दादा से बात होती है.. और फिर वो वहाँ तक आने का रास्ता बताते है.. कौन सी नम्बर का बस पकड़ना है और कहाँ उतरना है सो।..
यहाँ मुम्बई में ईस्ट-वेस्ट का बड़ा लफड़ा रहता है। .. किसी तरह पूछते-पाछते पहली बार किसी लोकल ट्रेन की ओर बढ़ा.. रे बाबा !!! … इतनी ठुस्सम-ठास भीड़ … मैया गे!! … किसी तरह अंदर घुस गए.. साला साँस लेने में तकलीफ़.. ऊपर से मेरा बड़ा वाला बैग।.. साला उस टाइम लग रहा था काहे खातिर इतना बड़ा बैग ले के आया बे!.. साला अपने को संभालूँ या इस बैग को! .. किसी तरह साँस थाम के गोरेगांव तक पहुँचा .. जैसे ही उतरने को आया.. ले भारी भीड़!.. उतरने के पहले ही चढ़ने लगी.. मैं बीच में फंस गया.. और फिर तब तक लोकल भी चल पड़ी.. एक सुधी जन ने पूछा ‘गोरेगांव में उतरना था क्या ?’ मैं बोला ‘हाँ’ .. ‘तो पहले से ही दरवाजे के सामने आने को मांगता न .. सोचोगे कि ट्रेन रुकेगी तब आराम से उतरोगे तो कभी नहीं उतर पाओगे और खास कर के अभी के वक़्त में .. सब के छुट्टी होने का टाइम है ये.. अगला स्टेशन मलाड है.. अभी से दरवाजे के सामने चले जाओ।‘ उनके कहे अनुसार दरवाजे तक गया और मलाड में भारी मशक्कत के बाद ट्रेन से उतरा.. ऐसे फील हो रहा था जैसे कोई युद्ध जीत लिया हो! .. अब मेरी हिम्मत नहीं रह गई थी कि दुबारा लोकल से वापिस गोरेगांव जाऊँ..साला पता नहीं फिर दादर में न उतरना पड़ जाय।.. ऑटो पकड़ा और गोरेगांव आया। .. और फिर वहाँ दादा के कहे अनुसार अमुक नम्बर का बस पकड़ा और गन्तव्य तक पहुँचा।  .
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खैर अब तक बकैती कर रहा था… :)
लेकिन अब आता हूँ असल मुद्दे पे..
मुझे नहीं पता था ये लोग कहाँ रहते हैं और कैसे रहते हैं ?
जिस तरह से बम्बईया हीरो लोग अपनी गुणगान बाँचते थे गाँव में.. अपना स्टेटस दिखाते थे.. उससे एक अलग किसिम का छवि बन गया था.. उसी छवि को लिए हमारी आँखें उसे ढूंढ़ रही थी.. बस में खिड़की किनारे बैठा था.. शहर के नज़ारे दिख रहे थे.. ये चमचमाता शहर.. ऊँची-ऊँची बिल्डिंगें.. भारी बिजी लोग-बाग़ और ट्रैफिक की भीड़ें.. मेरा गन्तव्य था गोरेगांव फ़िल्मसिटी, मयूरनगर।.. मयूर नगर में उतरा तो देखा कि बहुत बड़ी-बड़ी इमारतों का समूह.. हमने फोन लगाया भैया को.. ‘दादा हम मयूरनगर पहुँच गए है’ .. ‘ठीक है तुम वहीँ रुको हम आ रहे है’ … मैं सोच रहा था भैया ई बिल्डिंग के गेट में से ही बाहर आएंगे.. मैं टकटकी लगाए उस गेट के तरफ ही देख रहा था.. करीब दस मिनट बाद भैया का फोन आया ‘कहाँ हो बाबू ?’ .. मैं ‘यहाँ एक चाय की दूकान है न वहाँ’ .. ‘हाँ ठीक.. देख लिए।‘
फिर भैया आये और बैग उठा लिए और बोले चलो .. मैं सोचा बिल्डिंग की तरफ चलना है लेकिन वो तो बिल्डिंग के बाउंड्री के बगल में से ले जाना शुरू किये! .. एक अजीब सा अनुभव.. पहली बार.. ऐ संकरी-संकरी गलियां और बदबूदार बास.. नाक सिकोड़ गई.. टीनेँ और केरकेट से बनी झोपड़े.. मैं पूछ बैठा ‘दादा ई तो स्लम्स जैसा कुछ लगता हैं!’
‘हाँ स्लम्स ही है.. लेकिन बम्बईया भाषा में इसे चाल या फिर झुग्गी कहते हैं’
खैर तब भी रहा और आज भी जाते रहता हूँ.. इसी तरह अपने तरफ के लगभग सभी बम्बईया हीरो के ठिकानों पे जाता रहता हूँ।.. कल्याण,डोम्बिवली,थाने, घाटकोपर, अँधेरी,गोरेगांव,मलाड.. डॉट..डॉट जगहों पे आना जाना लगा रहता हैं।… मेरे भैया लोग गोरेगांव फ़िल्म-सिटी में काम करते हैं.. बहुत बड़ा एरिया है.. अंदर तमाम तरह की चकाचौंध और मायावी दुनिया.. बड़े-बड़े फ्लोर्स.. लाइट कैमरा सजावट और एक्शन-एक्शन,कट-कट की गूंजती आवाजें!.. एक अलग ही दुनिया… बेहद ही खूबसूरत..  लेकिन फ़िल्म-सिटी के बाउंड्री के बाहर की दुनिया?.. टोटली डिफरेंट!! .. लगता कि जैसे अर्श से लाकर फर्श पे पटक दिया हो.. बाउंड्री के बाहर बड़ी बिल्डिंगें हैं तो उससे कहीं जादा झुग्गी-झोपड़ियां.. और इन झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के चलते ही फ़िल्म-इंडस्ट्री रन करती है, कर रही है.. ईंधन यही लोग हैं.. लेकिन इनकी जिंदगी!?
हम इससे पहले कहीं भी रूम देखने जाते थे तो सबसे पहले पानी और लेट्रिन की व्यवस्था देखते थे.. लेकिन यहाँ ? .. 4000-5000 रुपया रूम-रेंट देते हैं लेकिन इन सब का बड़ा तकलीफ़।.. पानी के तो क्या कहने .. एक छोटा सा रूम है.. एक कोने में बर्तन माँजने की जगह जिसे ‘मोरी’ कहते है.. इस मोरी में नहायेंगे,बर्तन धोएंगे और सुसु भी !.. आधा रूम केवल पानी के डब्बों और ड्रम से भरे हुए होते हैं.. सुबह होते ही नल के सामने ऐ लम्बी डब्बों की कतार.. सब जल्दी में.. हड़बड़-हड़बड़,केचर-केचर.. मोरी में नहाने बैठो तो सावधान! .. जादा छटपटाने का नहीं.. वैसे आपके हाथों को उतनी आजादी भी नहीं मिलेगी.. हाथ फ़ैलाने चाहो तो मोरी की दीवारें रोक लेगी.. चोट भी लग सकती है(मुझे लगी है बहुत बार).. और ज़रा छटपटाना चाहो तो साबुन और शैम्पू की झाग बगल में उबल रही दाल या फिर सब्जी में भी जा के गिर सकती है!! .. दो नम्बर के लिए सुलभ शौचालय के बाहर ये लम्बी कतारें! लोग हाथ में डब्बे ले किसी तरह अपने को कण्ट्रोल करते आराम से दिखते हैं! ..  तो कुछ हाथ में डब्बा लिए झाड़ियों की ओर चल देते हैं.. कुछ नहीं बहुत कोई.. सामने ‘लापतागंज’ का सेट लगा हुआ है और उसके नीचे हर कोई बीड़ी सिगरेट फूंकते हुए हल्का हो रहा हैं। इतनी बदबूदार जगह की क्या बताया जाय! .. ये सब देख के राज ठाकरे का वो ब्यान ध्यान में आता ‘डेंगू मलेरिया फैलनी वाली बात!’। .. और बात सही भी है.. अभी के महीनों में सबसे जादा डेंगू-मलेरिया के शिकायत इन्हीं इलाकों में से आते हैं। .. इतनी तंग जगहें की क्या बताया जाय! .. जहाँ एक कमरे में ठीक से दो जन न रह पाये वहाँ 7-8 जन रहते हैं! मैं अपने घर का उस हिसाब से अनुमान लगाऊँ तो मेरे घर में आराम से 150 आदमी रह सकते हैं।.. लेकिन फिर भी रहने को मज़बूर हैं.. जादा स्टैण्डरी दिखाएंगे तो फिर पैसे कहाँ बचाएंगे.. जितना भी स्टैण्डरी दिखाना है वो गाँव जा के दिखाएंगे। .. दिन भर शूटिंग में बिजी रहते हैं.. सुबह के आठ बजे निकलेंगे तो रात को पता नहीं कितने बजे तक आएंगे.. हालाँकि इन्हें भी ऑवरटाइम की पड़ी रहती हैं।.. जितना ऑवरटाइम उतने जादे पैसे।.. बड़े बजट की फ़िल्म से लेकर सीरियल्स और ऐड फ़िल्म तक .. कौन हीरो कौन हीरोइन कौन डायरेक्टर.. इन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, बस काम मिलना चाहिए.. वही लाइट कैमरा और पेंटिंग सेंटिंग.. और उन्हीं लाइट कैमरों में खोये हुए तमाम एक्टर्स और डायरेक्टर्स.. लेकिन फ़िल्म-सिटी की चाहरदिवारी के बाहर उतनी ही धुंधली और अँधेरी।.. जिनकी पसीने और मेहनत से फ़िल्म इंडस्ट्री इतनी चमकती दमकती दिखाई देती है उनकी गलियों में ये एक्टर एक दिन भी बीता ले न तो अगले दस दिन तक शूटिंग में न आ पायेंगे ये मैं गारन्टी के साथ कहता हूँ।
लाखों ऐसे लोग हैं जिनके बदौलत ये मुम्बई चमक रही है। दुनिया में अगर बॉलीवुड है तो इन झुग्गीवालों के चलते ही है।..
और भी बहुत सारी बातें है .. लेकिन फिर कभी। :)
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गंगा महतो
खोपोली