Sunday, January 24, 2016

Chacha-Bhatija

-: चाचा-भतीजा :-
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गाँव में हर कोई किसी न किसी रिश्ते से बंधा होता है. कोई हमारी दादी की उम्र की भौजी लगती है तो कोई हमारी भौजी की उम्र की दादी . कोई पापा के उम्र का भैया लगता है तो कोई मेरे से १० साल छोटा मेरा दादा . और ऐसे ही हमउम्र में भी रिश्ते होते हैं . लेकिन चाचा भतीजे के जो रिश्तें होते हैं ना वो बड़े अनोखे होते हैं . मतलब हमेशा माँ-मौसी वाली, रिश्तें में जो चाचा लगता हैं वो हमेशा भतीजे के ऊपर माँ-मौसी के बाउंसर मारता रहता हैं और भतीजा बिल्कुल भी बल्ला नहीं चलाता . दस साल का चाचा मेरी माँ-मौसी की ऐसी-तैसी कर देता हैं मजाक-मजाक में और मैं बस मुस्कुरा के रह जाता हूँ .वे पुरे हक़ के साथ गालियाँ देते है और हम भतीजे भी उनका हक़ समझ कर जाने देते है. अगर कभी थोड़ी-बहुत कहा-सुनी हुई तो वो ये जताने में ज़रा सा संकोच नहीं करते कि- ‘अबे हम तुम्हारे चाचा लगते है चाचा, चाचा का मतलब समझते हो न ‘. और बस बात ख़त्म और ठहाके शुरू .
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ऐसे ही हमारे गाँव में दो लड़के है , मेरे सहपाठी भी रह चुके हैं. एक लगल महतो और दूसरा गुड्डू महतो. गुड्डू महतो चाचा लगता हैं लगल महतो का और मेरा भाई. मैं एक साइकल में अकेला स्कूल जाता था और वो दोनों एक साथ में,क्योंकि लगल को याने भतीजे को साइकल चलानी नहीं आती थी. चाचा हमेशा साइकल चलाता और भतीजा पीछे कैरिअर में किताबें पकडे बैठा रहता और जब कभी भी उचक/कुद के बैठने में गड़बड़ी करता चाचा माँ-मौसी की कुंडली निकाल के रख देता. लेकिन थे बड़े पक्के दोस्त आज भी हैं,और चाचा-भतीजा वाला सिंड्रोम अभी भी कायम हैं .मुझे तब का याने स्कूल के दिनों का एक वाक्या अभी भी याद हैं.
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हमारे गाँव से हमारा स्कूल भूषण उच्च विद्यालय,नावाडीह पांच किलोमीटर दूर है,और इस बीच में दो-तीन गाँव पड़ जाते हैं .इस पांच किलोमीटर के दरमियाँ स्कूल आने जाने के क्रम में भतीजा चाचा से नहीं तो कम से कम २०० गालियाँ माँ-मौसी की ज़रूर खाता था . और जहाँ लड़कियां देखी चाचागिरी और झाड़ देता था. ऐसे ही एक लड़की थी कटघरा गाँव की,जो कन्या उच्च विद्यालय,नावाडीह में पढ़ती थी,पैदल जाती थी. हमलोगों के स्कूल जाने के क्रम में रोज़ भेटाती थी और हमलोग भी ४-५ मिनट के लिए साइकल के पैडल कम और ब्रेक ज्यादा लगाकर के चलते थे. और जैसे ही स्पीड कम हुई चाचा की चाचागिरी शुरू. वो शुरू में तो इनकी बातों को इग्नोर करती रही लेकिन धीरे-धीरे उन्हें भतीजे पे दया आने लगी.एक दिन उस लड़की से बर्दाश्त न हुआ,उन्होंने टोक लिया-‘ये लड़का है कौन,रोज-रोज मैं देखती आ रही हूँ तुम्हे बस माँ-मौसी की गालियाँ देता रहता हैं और तुम बस सुनते जाते हो,कोई दूसरा लड़का होता तो कब की इसकी धुलाई कर दिया होता और तुम हो कि बस सुनते जा रहे हो,कौन है ये और क्या लगता है तुम्हारा.’
हमलोग तो सब सन्न रह गए,सोचने लगे अब भतीजा क्या बोलेगा......... अगले पल
भतीजा- आप इनकी बात कर रही हैं ?
लड़की –हाँ.....इसकी ,कौन है ये ???
भतीजा बड़ी मासूमियत से – ये ना ...हमारे पप्पा हैं .....
अब लड़की तो एकदम्मे अवाक और हमलोगों के मुंह से ठहाकें लेकिन इन्ही ठहाकों के बीच से चाचा भतीजे को डांट लगते हुए – ‘अरे लगला तोरी मौसी के बिहा करो जल्दी से बैठ रे, लेट हो रहा है स्कूल को नहीं तो अपत्तिया मास्टरवा सोंट के रख देगा’. कुछ देर आगे चलने के बाद चाचा बोलता है – ‘ बेटा लगल....हमें तुमपे फकर है रे...आजकल साला लड़का लोग लड़की के चक्कर में का का नहीं करता हैं और तुम लड़की का साथ न दे के हमारा साथ दिया... गर्व हैं तुमपे रे....लेकिन ये मत सोचना कि अब हम तुमको गरियाना छोड़ देंगे? हम तो जब तक रहेंगे तब तक गरियाते रहेंगे...क्यों.... क्योंकि हम तुम्हारे चाचा है चाचा... समझा ...’
लगल पीछे बैठे हुए – ‘ जी चाचू....समझ गया ‘

                              समय बीतता गया.....मेट्रिक की परीक्षा में दोनों सेकंड डिवीज़न से पास हुए. भतीजे की परिवारिक प्रोब्लम के चलते शादी करनी पड़ी. शादी के दिन चाचा की एक्साय्मेंट देखते ही बन रही थी-“ अरे आज हमारे बेटे का बिहा है,जिसको जितना पीना है हम पिलायेंगे रे,पूरा हिकवा भर-भर के पिलायेंगे रे.आज तो ईकर ससुरार में तो गर्दा उड़ेगा रे गर्दा”.
और हुआ ऐसा ही. पुरे बाराती का नेतृत्व गुड्डू महतो कर रहा था. नचनिया के ऊपर पैसों की बौछार और नागिन डांस के तो क्या कहने थे. जब समधी मिलन का वक़्त आया तो वर पक्ष से समधियों की कतार में सबसे आगे यही थे. ओरिजिनल समधियों के मिलन होते ही गुड्डू महतो ने लड़की के बाप को गोद में उठा के झूमर गाते हुए पुरे पांच मिनट तक डांस किया था. पुरे वधु पक्ष में चर्चा का विषय था कि ये लड़का है कौन ? किसी ने बता दिया कि ये दुल्हे का चाचा लगता हैं फिर क्या था ब्याह में दी जाने वाली गाली पूरा गुड्डूमय हो गया.

कुछ बरस और बीता गुड्डू महतो पढने के लिए बोकारो शहर चला गया और लगल अपनी गृहस्थी में लग गया. एक दिन लगल ने गुड्डू को फ़ोन किया....
लगल थरथराते हुए बोल रहा था.... – गुड्डू चा.... एक बहुत बड़ा प्रॉब्लम हो गया है
क्या हो गया रे तोरी माय के ...
मैया बहुत सीरियस है गुड्डू चा.
का बात कर रहा है लगल...क्या हुआ है रे भौजी को ??
वो ...मैया.... कुँवा में पानी खीचते समय फिसल के गिर गई, बहुते चोट लगा है,खून भी बहुते बह गया है,फुसरो के रीजनल हॉस्पिटल में भर्ती किये है,अभी तक बेहोश है......डाकटर सब बोल रहा है कि खून की सख्त ज़रुरत है...हमने और बप्पा ने तो दिए है फिर भी कम पड़ रहा है....अगर आप आ जाते तो....
अरे चिंता मत करो रे...भौजी को कुछ नहीं होगा....तोरा चाचा अभी जिंदा है रे सरीर का पूरा खून दे देंगे भौजी के खातिर, लेकिन कुछो होने नहीं देंगे ..... हम अभी आ रहे है....चिंता न करो.
फिर गुड्डू तुरंत बोकारो से कार बुक किया और रीजनल हॉस्पिटल फुसरो आ गया. और यथासंभव उसने लगल की माँ को खून दिया. ईश्वर की कृपा से लगल की माँ को होश आया और धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगी. एक हफ्ते बाद उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया. तब तक गुड्डू वही हॉस्पिटल में ही रहा लगल के साथ भौजी के सेवा-सुसुर्षा में.
घर आ जाने के बाद भी अगर लगल की माँ को कुछ ज़रूरत होती है तो गुड्डू तुरंत लगल को दहेज़ में मिली हीरो स्प्लेंडर प्रो को लेकर नावाडीह से सामान लाकर हाज़िर कर देता. अब लगल की माँ लगभग स्वस्थ हो चुकी है. एक दिन लगल की माँ गुड्डू को बुला के कहती है...
अरे ऐ गुड्डूवा तनिक हिया आव तो..
हां भौजी बोलिए...
अरे हमर सेवा तो बहुत कर लिया...तनिक आपन माय के भी ख्याल कर लियल करो...बेचारी से अब काम-धाम नहीं किया जाता घर-द्वार का. बोकारो में रह रहे हो कोन्हो लड़की-वडकी पटाया की नहीं? अरे बिहा कर लो अब......देखो तुम्हारे से छोटे लड़के बिहा कर के बैठे हैं गाँव में और तू बस घुमे जा रहा है...... कब करेगा बिहा ??
भौजी.....हम तो एके लड़की से बिहा करेंगे....
भौजी उत्साहित होते हुए पूंछती हैं- कौन है रे वो गुड्डूवा ?
गुड्डू थोडा आँखे तरेर के भौजी से कहता है – तोर बहिन.......
भौजी थोडा शरमाते हुए गुड्डू के पीठ में थप्पड़ मारते हुए बोलती है – अरे हट पगला कही का.....नहीं सुधरेगा तू..
गुड्डू लगल को जोर से आवाज़ लगाते हुए कहता है – अरे ये लगला....चल स्प्लेंडरवा निकाल रे...आज तोर मौसी के बिहा कर के लइए आते है.... भौजी को हमारी ख़ुशी देखे नहीं जा रहा हैं...
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अरे अरे .....गुड्डू को पूरा पता है कि लगल के मौसी का बड़ा लड़का उनसे उम्र पुरे दस साल बड़ा है,लेकिन है तो भौजी की बहन और लगला की मौसी ना .
भौजी...भौजी होती हैं ,भौजी की बहन और प्यारी होती हैं और सबसे प्यारा होता है भतीजा...
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गंगा महतो
खोपोली

Naitik Shiksha

।। नैतिक शिक्षा ।।

जनहित में जारी - खास कर के उनके लिए जिनकी नई-नई शादी हुई हैं,या फिर होने वाली हैं .
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दसवीं क्लास में थे, हिन्दी के एक मास्टर जी थे पढ़ाने के साथ-साथ व्यवहारिक और नैतिक ज्ञान भी ख़ूब देते थे।

एक दिन टॉपिक रख दिए - बीवी को कैसे बुलाओगे ? सिचुएशन कुछ इस तरह हैं - यदि आपकी बीवी आपके आस-पड़ोस की चाचियों दादियों, भाभीयों,बहनों आदि की मंडली के साथ बैठी हो और उसमें आपकी माँ भी शामिल हो,और आप घर के अंदर अकेले हो.. ऐसे में आपको अपनी बीवी को अंदर बुलाना हैं कुछ इस तरह से कि मंडली में बैठी किसी भी महिला को बुरा न लगे या फिर कोई प्रेमरस के कमेंट न पास करे,तो आप कैसे बुलाओगे ??
लगे सब छात्र दिमाग भिड़ाने (ऐसी बातों में दिमाग ही भिड़ाया जाता हैं दिल नहीं  ). एक सहपाठी मितन रजवार उठा और बोला - सर, हम अपनी बीवी का नाम ले के बुलाएंगे. जैसे .. ऐ सरिता तनिक अंदर आव तो.
मास्टर जी - मालुम हैं रे....तुम्हारी ददिया का बोलेगी, आज कल के लड़के सब भी न,टीभी देख-देख के गाँव के मान-मर्यादा सब भूलने लगे हैं. बीवी का नाम ले के बुलाने लगे हैं लौंडे. हमरा तो आपन नाम तबे याद आता हैं जब हम भोट देने जाते हैं।... अरे मितना तुम्हारा ये बीवी का नाम ले के बुलाने वाला युक्ति काम नहीं करेगा रे. दादी को बुरा लग जाएगा।
मैं क्लास का रोल नं -01 बंदा, मैं उठा और बोला - सर, मैं अपने बच्चे के नाम की माँ कह के बुलाऊंगा , मतलब सर अगर मेरी बेटी का नाम फुल्की हैं तो हम उसे फुल्की की माँ कह के बुलाऊंगा । ऐ.. फुल्की की माँ तनिक अंदर आव तो ।
मास्टर जी - हाँ... ई तनिक ठीक हैं, लेकिन रुको... मान लो तुम्हारी नई-नई शादी हुई हैं और तुम्हारा कोई बच्चा-वच्चा नहीं हैं तो फिर कैसे बुलाओगे ?
मैं - फिर तो पता नहीं सर...
रामेसर ठाकुर उठा और बोला - सर , हम ऐसे बुलाएंगे... ओ जी....ज़रा अंदर आना एक काम हैं...मतलब सर हम किसी बहाने से अंदर बुला लेंगे।
मास्टर जी - मालुम है रे रमेसरा तुम्हारी पड़ोस वाली भाभी क्या बोलेगी,... छोड़ा से बीवी की जुदाई एक पल भी बर्दाश्त नहीं होता हैं. अरे सगर घरी तो तुम्हारे पास ही रहती हैं, पाँच-दस मिनट के लिए हमारे साथ बैठ लेगी तो क्या जाएगा तुम्हारा. ज़रा भी जुदाई बर्दाश्त नहीं होता. जा बहिन नहीं तो बुरा मान जायेगा रामेसर बाबू. ....और फिर सब ठहाके मार के हसेंगे रे रामेसर... न न ई आईडिया तो पूरा फ़ैल.
फिर धनेसर महतो उठा - सर, हम आँख मार के बुलाएंगे।
मास्टर जी - और अगर तुम्हारा आँख मारना किसी अन्य भाभी ने देख लिया ना , तो तुम्हारी आँखें नोच डालेगी रे धनेसरा ।
फिर सीताराम तुरी उठा - सर, हम कंकड़ मार के इशारे से बुलाएंगे।
मास्टर जी - ई सीताराम थोड़ा पहुँचा लगता हैं. लेकिन वो पत्थर अगर किसी दूसरी औरत को लग गया तब रे सीताराम । न न ये थोड़ा रिस्की हैं। कोई और तरीका बताओ रे जिसमें रती भर का भी रिस्क न हो ... ,हैं कोई और नया तरीका बताने वाला ?

अब हमारा थिंक टैंक खाली हो चुका था . हमलोगों ने मास्टर जी से आग्रह किया ,अब आप ही बता दीजिये सर. हमलोगों के पास अब कोई अन्य आईडिया नहीं हैं।
मास्टर जी - अरे अपनी बीवी को बुलाना हैं ना बिना किसी को बुरा लगे तो अपनी माँ को बुलाव रे..... और थोड़ा ज़ोर से चिल्ला के ... मैया!!!!...ऐ मैया....कहाँ ही गे.... हमर नयका वाला फुलपेंटवा कहाँ रख देल्ही गे, ढूंढ़ रहे हैं कब से मिल ही नहीं रहा हैं,मैया~~~~... ये मैया~~~~....
तुम्हारी माँ खुद तुम्हारी बीवी को भेजेगी - अगे ये बपढोहनी.... जा के तनिक देखो न जल्दी से बेटवा के हमर..अंदर चिल्ला रहा हैं, फुलपेंटवा नहीं मिल रहा हैं और तुम यहाँ बैठ के बातें कुंद रही हो.अरे जाव..अब हम कितना ख़याल रखेंगे।
बीवी फ़ौरन भाग के अंदर आयेगी रे तुम्हारे पास,और किसी को कुछ भी बुरा नहीं लगेगा। समझे।
अब तो मास्टर जी की जय बोलना पड़ेगा ।। 
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गंगा महतो
खोपोली

Friday, January 22, 2016

रती महतो का बैल

:::- रती महतो का बैल -:::
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मैं करीब 8-9 साल का था. कार्तिक अगहन का महीना चल रहा था. धान की कटाई मेसाई अपने चरम पे था. अभी हमलोगों की कटाई मेसाई आधा भी नहीं हुआ था कि हमारा एक बैल बीमार पड़ गया. काफ़ी दवा-दारु व सेवा-सुश्रुषा के बावजूद भी एक हफ्ता से ज्यादा नहीं बच पाया. अब एक बैल से बाकी के बचे काम और चास-बास कैसे होई ? जब भी बैलगाड़ी नारना होता तो बड़े पापा का एक बैल साथ में नारना पड़ता या तो फिर उनके दोनों जोड़े बैल. पापा अपने फुट(अकेले) बैल के लिए जोड़ी ढूंढ़ रहे थे. 3 दिन बाद पड़ोसी के पुका महतो सुबह-सुबह खलिहान में आये और खैनी मलते हुए पापा को बताया कि हेठकुल्ही के रती महतो का भी एक बैल मर गया हैं और वह बचा हुआ बैल को बेच के नया जोड़ा बैल खरीदने का विचार कर रहा हैं, आप कहे तो बात करू उससे. वैसे बैल एक नम्बर हैं, कभी बैठता-वैठता नहीं हैं गाड़ी-घोड़ा और हल-वल जोतने में… ।
पापा ने बोला – अरे मर्धे… तो देर किस बात की. चलो अभी चलते हैं…।।
10 बजते-बजते पापा और पुका महतो रती महतो का बैल 3500 रूपये में खरीद लाये. घर में घुसने से पहले द्वार से ही पापा ने मम्मी को आवाज लगाया- ये सोमरी (दीदी) माय… तनिक बाहर आव तो.. रती महतो के घर का बैल खरीद लाये हैं,इसका गृह प्रवेश कराओ तो. मैं घर से बाहर आया और पापा को बताया कि मैया बरिया में हैं अभी बुला के लाते हैं. यहाँ ध्यान देने की बात हैं कि लक्ष्मी का स्वागत घर की लक्ष्मी के द्वारा ही होता हैं. मैं मम्मी को बुला लाया. मम्मी एक लोटा पानी और एक दोने में धान भर के लाई. बैल के चारों पैरों को धोई,प्रणाम की और दोने का धान खिलाकर बैल को घर के आँगन तक ले आई. पापा ने कोचरा का तेल ले बैल के सींगों में मालिश कर के उसे घर के पुराने बैल के साथ खूंटे में बाँध दिए. दोनों बैलों में दो-चार दिन का मनमुटाव रहा,एक दूसरे को सिंग दिखाते रहे लेकिन साथ में काम करते-करते अच्छी खासी दोस्ती हो गई. अब तो वो दोनों एक साथ एक ही गमले में मुँह डाल के पानी पीने लगे थे. पेट भर जाने के बाद एक दूसरे को चाटते भी थे. ऐसा नहीं हैं कि दोस्ती खाली उन दोनों के बीच हुई थी..वह हमारा भी दोस्त बनने लगा था. वह हमारे परिवार का एक सदस्य बन गया था.
मेरा पशु-पक्षियों से हमेशा से लगाव रहा हैं और पशु-पक्षियों का हमसे. घर में मुर्गा-मुर्गी, कबूतर, बकरा-बकरी, गाय-बैल,बछड़े सब थे. उनको खिलाने-पिलाने, चराने का ज्यादा ध्यान में ही रखता था. मेरे दिन की शुरुवात कबूतर,मुर्गियों को दाना देकर व गायों-बकरियों को उसका आहार दे के ही शुरू होता था. उसके बाद जंगल जाता था बकरियों के भोजन के इंतज़ाम हेतू. उसके बाद मेरा स्कूल जाना. स्कूल से जैसे ही घर आता और मेरा आवाज़ गूंजता मुर्गियां कोट…कोट..करके उड़ते हुए और कबूतर गुटरगूँ की आवाज़ के साथ मेरे पास आ के मंडराने लगते. गाय बकरियां भी आवाज़ देने लगती. घर में अचानक हुए इस बदलाव से बाहर आये लोग कभी-कभी चोंक जाते. एक दिन हमारी मौसी जो मेहमानी में आई थी मम्मी के साथ बारी में बैठी थी, अचानक से हुई घर में इस हलचल के बारे में माँ से पुंछी तो माँ ने बताया कि – लगता हैं इनलोगों का मिरवा(पालनहार) इस्कूल से आ गया हैं… मैं स्कूल से थका हरा भूखा जब अपने को इन सब घिरा हुआ पता तो मेरा भूख कुछ देर के फुर्र हो जाता. पहले इन सब को दाना खिलाता,बकरियों,गायों,बैलों को कुछ पालहा खिलाता फिर खुद खाता. हमारा लगाव इन सब से कुछ इस तरह से था कि,अगर मेरा मुर्गा किसी मुर्गी के पीछे भाग रहा हो और अगर हमने ती-ती-ती कर के आवाज़ लगा दी तो वह मुर्गी को छोड़ कर मेरे पास चला आता.
खैर बात हो रही थी रती महतो के बैल की. वैसे वो अब हमारा बैल बन चूका था लेकिन रती महतो के बैल से ही जाना जाता था. वो बैल सही में हमारे घर के लिए लक्ष्मी साबित हुआ. कभी बीमार नहीं हुआ. कभी भी गाड़ी या फिर हल जोतने में कोढ़ियापना नहीं किया. वो करीब 7 साल तक हमारे घर का खूब सेवा किया. इन सात सालों के दौरान उसने तीन जोड़ियां भी जोड़ी क्योंकि वे उसको काम के मामले में टक्कर नहीं दे पाते थे.
उस टाइम गाँव में इंटरटेनमेंट के कोई साधन नहीं थे सिवाय एक दो घर को छोड़ के जिनके यहाँ टी.वी. थी और वो अपने आप को धीरू भाई अम्बानी के रिश्तेदार से कम नहीं समझते थे. तो अपना इंटरटेनमेंट गाय गोरु के मध्य ही होता था. मैं और मेरे छोटे भाई उस बैल के आस-पास छुआ-छुई का खेल खेलते थे. बैल के टांगों के बीच में से आर-पार होते थे. और इस दौरान बैल टस से मस नहीं होता था. लगता था कि जैसे वो खुद हमारी खेल का हिस्सा हो और खेल का ख़ूब आनंद ले रहा हो. अपना सर ऊपर और पुंछ सीधा करके हमलोगों को सहयोग प्रदान करता. उसको जब चराने ले जाता तो कुछ देर चरने के बाद वो हमारे पास आ के बैठ जाता और सिंग से हमें कुचने लगता. वो हमें मारता नहीं था बल्कि सिग्नल देता था कि मेरी गुदगुदी करो. फिर मैं उसको हाथ से उसके गर्दन और माथे को सहलाता. वो एकदम से विभोर हो जाता. आँख मूँद के गर्दन तान देता. और अगर मैं जान बुझ के गुदगुदाना छोड़ देता तो वो मुझे फिर से सिंग से कुचने लगता. धान कटाई के बाद सभी मवेशी छूटे हो जाते हैं. इस दौरान उन्हें चराने जाना नहीं पड़ता था लेकिन सुबह-सुबह जंगल की ओर छोड़ने ज़रूर जाना पड़ता था. बिना गुदगुदी लिए वो हमसे विदा नहीं होता था. वो हमें जहाँ कहीं भी भेंटा जाता गाँव में, गली में, टांड़ में, जंगल में .. पांच मिनट टाइम उसको देना ही पड़ता था. हमलोग फुसरो मूवी देखने जाया करते थे, फुसरो का गाड़ी पकड़ने के लिए गांव से दो किलोमीटर पैदल जाना पड़ता था मैन रोड के लिए. और इस दो किलोमीटर के दरमियान ही मेरा बैल चरा करता था. पैदल जाने के दौरान दोस्तों से हुलड़बाज़ी करते हुए अगर मेरी आवाज़ किसी भी तरह से उसके कान में पड़ गई तो वो दौड़ता हुआ हमारे पास आ जाता और सिंग से कुचने लगता. फिर उसको बीच रास्ते में ही गुदगुदाओ. गुदगुदाने के बाद भी नहीं मानता और हमारे पीछे-पीछे आने लगता. उसको सोंटे से मार के भगाता फिर भी पीछे आना नहीं छोड़ता. मेरे साथ का लगल महतो बोलता- अबे हमलोगों के साथ फुसरो जाएगा का सिनेमा देखने, देख अभी छोड़ हमलोगों का पीछा लेट हो रहा हैं नहीं तो सन्नी देओल को बोल देंगे, सुना हैं सिनेमा में एक साँढ़ को बहुते पटक-पटक के मारा हैं… फिर उसको दो तीन सोंटा जम के मारते तब वो हमारा पीछा छोड़ता. एक अलग ही रिश्ता बन गया था उसके साथ कभी न टूटने वाला जैसा.

समय बीतता गया, सात साल तक वो लगातार हमारे परिवार की सेवा की. अब वो बूढ़ा होने लगा था, पहले जैसी अब ताक़त नहीं रह गई थी शरीर में. छोटे-मोटे हल्के काम लिए जाते थे उससे. और अपनी खेती-बारी थोड़ी ज्यादा थी, ज्यादा काम कराने से थकने लगा था वो. घर में विचार-विमर्श हुआ कि अब एक जोड़ी नये बैलों की खरीदी की जाय. नए बैल ख़रीदे भी गए. जैसे ही नए बैल ख़रीदे जाने की सुचना मेरे मौसी घर पहुँचा, अगले दिन मौसा जी मेरे घर पे. उन्होंने पापा से बोला – साढ़ू जी अब जब आपने नए बैल खरीद ही लिए हैं तो पुराना रती महतो का जो बैल हैं वो हमें दे दीजिये. वैसे भी हमारी ज्यादा खेती-बारी नहीं हैं तो हम इस बैल से दो-ढाई साल निकाल ही लेंगे,घर में एक फुट बैल है और अभी उसका जोड़ा खरीदने के हालात में नहीं हैं… पापा ने मौसा जी को हाँ कर दिया. मैंने विरोध किया- नहीं… ये बैल कहीं नहीं जाएगा. ये यहीं रहेगा. लेकिन पापा ने जैसे तो ठान ही लिया था रघुकुल के रीत के जैसी कि एक बार साढ़ू जी को बोल दिया तो बोल दिया…. मेरे विरोध को 1857 के विद्रोह की भाँति दबा दिया गया. मौसा जी बैल को रस्सी में बाँध के ले जा रहे थे. एक अजनबी के हाथ में अपने को रस्सी से बंधा देख शायद वो भी समझ गया कि इस घर से मेरी विदाई हो रही हैं. बैल थोड़ा विरोध कर रहा था. सबके चेहरे को वो बारी से देख रहा था. मेरी आँखों में लबालब आँसू भर गए थे. मैं अपने-आप को रोक नहीं पाया , बैल के गले से लिपट गया और रो-रो के गुदगुदाने लगा. आँखों से अनवरत आंसू निकल रहे थे. मेरे को रोता देख मम्मी भी खुद को रोक नहीं पाई, वो भी मेरे से लिपट के रोने लगी. कुछ मिनट बाद वो मेरे को बैल से अलग कर ली. मौसा जी हाँकते हुए बैल को ले जा रहे थे. मैं गली में खड़ा हो बैल को जाते हुए देख रहा था, बैल भी पीछे मुड़-मुड़ के बार-बार मुझे देख रहा था. मैं खड़ा हो बस उसे निहारता ही रहा जब तक कि वो ओझल नहीं हो गया.

                      मैं एक हफ्ता गुमसुम गुमसुम रहा. एक दिन रात के खाने के बाद मैंने पापा को बोल दिया – बप्पा, आपने ये बहुत ग़लत किया, रती महतो के बैल को मौसा जी को दे के…. वो बैल हम सबकी लगातार सात साल से सेवा कर रहा था और आज जब वो काम करने में अक्षम होने लगा तो उसे मौसा जी को सौंप दिया. जब वो जवान था और काम करने में सक्षम था तो आप पुरे गाँव वालों को बोलते थे कि हमें बहुत अच्छा बैल मिला हैं,गाँव में ऐसा बैल किसी के घर नहीं हैं. आज तक एक काम में भी कभी अड़ा हैं न बैठा हैं. काड़ा (पाड़ा) के साथ भी नार देने से काड़ा को पछाड़ देता हैं. और आज जब शक्ति कम पड़ गई तो उसे मौसा जी के हवाले कर दिया… बहुत पाप लगेगा बप्पा हमलोगों को… देखा नहीं कैसा वो जाते वक़्त पीछे मुड़-मुड़ के देख रहा था.
पापा – अरे.. तो तुम्हें क्या लगता हैं कि मौसा जी खाली जोतने के लिए बैल को ले गए हैं.. वो भी सेवा-सम्हार करेंगे बैल का.
मैं – अगर मैं आपको बुढ़ापे में किसी वृद्धाश्रम में छोड़ दूँ ये कह के कि वृद्धाश्रम वाले भी आपका ख़ूब ख़याल रखेंगे, तब आप पे क्या गुजरेगी ??
पापा अब निरुत्तर हो चुके थे. काफी देर सोचने के बाद हमें आदेश दिए कि कल जा के मौसा घर से बैल को ले आना और मौसा जी बोल देना कि नए बैल की खरीदी के पैसे दे देंगे.
मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. पापा को मैंने गले लगा लिया. अगली सुबह लगल महतो के साथ डाइरेक्ट गिरीडीह का बस पकड़ के मौसा घर चला गया. मेरे घर से मौसा जी का घर करीब 20-22 किलोमीटर दूर हैं. जैसे ही मौसा के घर पहुँचा और आँगन में बात करने लगा, मेरी आवाज़ बैल के कान में जा पड़ी जो घर के पिछवाड़े में बंधा हुआ था. अब लगा वो ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ करने और छटपटाने. मौसी ने बोला कि का हो गया बैल को एकदम से छटपटाने लगा हैं. मैंने बोला- मौसा जी आप जा बस बैल का रस्सी खोल दो।. मौसा जी गए और रस्सी खोल दिए, वो सीधा भागता हुआ मेरे पास आ गया और मुझे सिंग से कुचने लगा. मैं बैठ के उसे गुदगुदाने लगा. फिर उसकी हालत पे नज़र गई, उसकी आँखों से बहे पानी से उसकी आँखों के नीचे गहरी काली धारियां बन चुकी थी. और शरीर भी दुबला गया था. मुझे उस दिन पता चला कि जानवरों के भी जज़्बात होते हैं,बिछुड़ने का ग़म उन्हें भी होता हैं और ग़म भुलाने के लिए रोते भी हैं. मैं उसे गुदगुदाते हुए बोल रहा था – अरे अब हम तुमको यहाँ से ले जाने आये हैं…. मौसा जी पापा ने बोल दिया हैं कि नया बैल खरीदने के लिए पैसे देंगे तो आप एक दिन जा के पैसे ले लीजियेगा.।

                          अब हम बैल को ले जा रहे थे. जैसे ही हाथ से थपकी मार के उसे बाहर गली की ओर निकालना चाहा वो समझ गया कि ये हमें वापस घर ले जाने के लिए आये हैं. अब तो उसने दूसरी थपकी मारने का मौका ही नहीं दिया. वो मेरे से आगे-आगे ऐसी गति से चल रहा था कि मानो जवानी वापस आ गई हो उसमें. कुछ दूर आगे चलने के बाद वो हमारे साथ हो लिया. हम तीनों जन किसी दोस्त की भाँति टहलते हुए घर की ओर आ रहे थे. बीच-बीच में चाय पानी के लिए रुकता तो वो शांत खड़ा हो के हमारी बाट जोहता. 20-22 किलोमीटर पैदल चल के घर आया लेकिन मेरे को ज़रा सा भी थकान महसूस नहीं हो रहा था.
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और अंत में… जिस तरह से आज इंसानों में जानवर प्रवृति घर कर रही हैं उनके लिए ये कविता..
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अक्सर शहर के जंगलों में ;
मुझे जानवर नज़र आतें है !
इंसान की शक्ल में ,
घूमते हुए ;
शिकार को ढूंढते हुए ;
और झपटते हुए..
फिर नोचते हुए..
और खाते हुए !
और फिर
एक और शिकार के तलाश में ,
भटकते हुए..!
और क्या कहूँ ,
जो जंगल के जानवर है ;
वो परेशान है !
हैरान है !!
इंसान की भूख को देखकर !!!
मुझसे कह रहे थे..
तुम इंसानों से तो
हम जानवर अच्छे !!!
उन जानवरों के सामने ;
मैं निशब्द था ,
क्योंकि ;
मैं भी एक इंसान था !!!
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गंगा महतो
खोपोली