कल के पोस्ट के बाद एक लड़की ने इनबॉक्स किया कि मैंने अभी आपका वो मुस्लिम वाला पोस्ट पढ़ी और सबके रिप्लायज भी.. और इसके बाद आपके इनबॉक्स में आई.. वैसे आपके सभी पोस्ट पढ़ती हूँ और उसके रिप्लायज भी.. लेकिन कल जब आपका पोस्ट पढ़ी तो मुझसे रहा नहीं गया और आपके इनबॉक्स तक आई।..एक बात बतानी थी आपको.. बात जरा लम्बी है, सो आप अपना नम्बर दीजिये उसी में सब बताती हूँ।
फिर मैंने उनको अपना नम्बर दिया.. और फोन पर बात हुई.. अब उन्होंने जो कुछ भी बताई मैं यहाँ रख रहा हूँ..
मैं धनबाद से हूँ.. और ये बात तब की है जब मैं SSLNT कॉलेज से इंटर कर रही थी.. मतलब साल 2007 की बात है.. कॉलेज से मेरा घर करीब 10 किलोमीटर दूर है.. पहली बार मैं इतना दूर आ-जा के पढ़ाई कर रही थी.. ऑटो-ट्रेकर के माध्यम से कॉलेज जाती थी और आती थी.. मुझे बाहरी दुनिया के बारे में कुछ भी नॉलेज नहीं था.. बस कॉलेज जाना और आना और अपने पढ़ाई-लिखाई से मतलब रखना.. मेरे पड़ोस गाँव की दो लड़कियां थी नाम अंकिता और जूही जो मेरे साथ दसवीं तक साथ पढ़ी थी और मेरे ही कॉलेज में साइंस ले के पढ़ रही थी.. वो दोनों वहीँ धनबाद में ही रहकर पढ़ाई करती थी.. मैंने परिवार की आर्थिक स्तिथि के चलते आर्ट्स चुनी थी.. खैर हमारी पढाई चल रही थी.. उन दोनों से हमारा मिलना-जुलना रोज हो ही जाता था कॉलेज में। .. अब आती हूँ मुख्य बात पे.. एक दिन अंकिता धनबाद में ही रिक्शे से कहीं जा रही थी.. उसका एक्सीडेंट हो गया.. उसके हाथ-पाँव-घुटने आदि में चोटें आई.. उसे बगल के ही एक नर्सिंग होम में ले जाया गया.. जहाँ उसका ट्रीटमेंट हुआ.. वहाँ डॉक्टर के चेले ने उसकी मरहम-पट्टी की.. नाम था उसका ‘मुन्ना’ .. बड़े ही प्यार से उसकी सेवा किया.. बड़े ही आत्मीयता से बात किया.. सलाह-मशविरा दिया.. और कुछ अन्य परेशानी न हो इसके लिए उसका नम्बर भी माँगा.. अंकिता ने अपना नम्बर दे दिया.. फिर उसकी फोन पे उससे बात होने लगी.. कुछ ही दिनों में वे एक अच्छे फ्रेंड बन गए.. अच्छा-खासा मिलना-जुलना भी होने लगा और घूमना भी... जूही जो उसके साथ रहती थी वो भी उसके साथ जाती थी.. एक दिन कॉलेज में वो मेरे डिपार्टमेंट में आई और बोली कि यार चल न मेरा एक बहुत अच्छा फ्रेंड है वो पार्टी दे रहा है.. तुम्हें भी उससे मिलकर बहुत ख़ुशी होगी.. चल न। .. ये पार्टी-वार्टी उस टाइम मैंने केवल फिल्मों में ही देखी थी.. रियल में कभी भी किसी भी तरीके के पार्टी में शरीक नहीं हुई थी.. तो मेरे मन में एक कौतुहल सा जगा.. मैंने जाने को हाँ कर दिया.. पार्टी धनबाद के एक जाने-माने रेस्टोरेंट में था.. हमलोग रेस्टोरेंट पहुँच गए लेकिन वो अभी तक आया नहीं था.. अंकिता ने फोन लगाया तो बोला कि हम जस्ट 10 मिनट में आ रहे है.. फिर करीब पंद्रह मिनट बाद वो अपने और दो दोस्तों के साथ एक चमचमाती फोर व्हीलर से वहाँ पहुँचा.. फिर हमलोग अंदर गए और पार्टी शुरू हुई.. वो जब डिश की चर्चा करते तो मुझे कुछ पल्ले ही नहीं पड़ता.. पड़ता भी कैसे, जब कभी कुछ खाई रहूँगी तभी तो पड़ता न!! .. फिर सबसे परिचय हुआ.. साथ में आये लड़कों ने अपना नाम बबलू और राजू बताया.. फिर मेरा भी परिचय लिए.. मेरे हाव-भाव से वे समझ गए कि इन्हें अभी बाहरी दुनिया के बारे में कुछ भी नॉलेज नहीं हैं.. लेकिन फिर भी वे बड़े अच्छे से बात कर रहे थे.. हँसी-मज़ाक हो रहा था.. मैं तो एकदम नई-नई.. शरमा-सकुचा के बात कर रही थी.. तो वे इस बात की भी खिंचाई कर देते.. बीच-बीच में वे अपनी अमीरी की भी बखान कर देते.. मैं उस दिन हाथ में मेहँदी लगाई थी तो बड़ी तारीफ किये सब.. अ तारीफ़ किसको अच्छा न लगे!.. अब चूँकि मैं अंकिता और जूही से थोड़ी सुंदर दिखती थी उन तीनों का ध्यान मेरे ऊपर ही बहुत ज्यादा था.. बात-बात में मेरी तारीफ और खिंचाई भी कर देते.. उनमें से जो बबलू था वो मेरे में ज़रा ज्यादा ही इंटरेस्ट ले रहा था.. खैर पार्टी खत्म हुई और हम घर जाने को हुए.. जाते वक़्त बबलू ने मेरे से मेरा कॉन्टेक्ट नम्बर माँगा.. मैंने बोल दिया कि मेरे पास कोई मोबाइल नहीं है और न घर में ही कोई मोबाइल है.. तो वो बबलू बोला कि यार कोई बात नहीं.. नहीं है तो आ जायेगी.. मैं अगले हफ्ते दिल्ली जा रहा हूँ.. तुम बोलो मोबाइल के साथ-साथ और क्या गिफ्ट चाहिए!? .. मैं बोली कि अभी इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।.. इतना बोल के हम घर को निकल गए।
अगले दिन कॉलेज आई.. कॉलेज छुट्टी के बाद कॉलेज गेट से बाहर निकली तो देखी कि रोड के उस तरफ फोर-व्हीलर लिए बबलू खड़ा था.. मेरे को उसने वहीं से हाथ हिलाते हुए एक मुस्कान के साथ हाई किया.. मैं भी इधर से हाई की और उसके बाद ऑटो पकड़ी और घर को निकल गई.. अगले दिन फिर वो उसी जगह में खड़ा मिला और फिर उसी अदा में हाई किया.. मैं भी हाई की और निकल ली.. अगले दिन फिर वही.. और फिर वो लगातार ही रोज-रोज आने लगा छुट्टी के टाइम और रोड के उधर से ही मुझे हाई करता.. और मैं भी बस उसके हाई का ज़वाब हाई में देती और निकल जाती.. वो करीब एक महीने तक लगातार वैसे ही हाई करता रहा.. इस दौरान मैं गौर कि वो हरेक दिन बड़े टिप-टॉप में आता था.. कभी कार से तो कभी अच्छी मोटर साइकिल से। अब हमारी भी एक तरह से आदत हो गई थी कि मैं गेट के बाहर निकलूँ तो मेरा ध्यान उधर ही जाता था, देखती थी कि वो आज आया है या नहीं आया है!.. एक महीने बाद जब मैं गेट के बाहर निकली तो मेरी नज़रें उसको रोड के उस किनारे ढूंढ़ रही थी.. लेकिन आज वो वहां नहीं था.. मैं जैसे ही आगे बढ़ी तो देखा कि वो सामने खड़ा है अपने बाइक के साथ और स्माइल करते हुए मुझे हाई बोल रहा है.. मैं भी हाई की... फिर इसके बाद वो बोला कि चलो न मैं आपको ड्राप कर देता हूँ.. मैं बोली कि सॉरी!! मैं खुद चली जाऊँगी.. आपका थैंक्स जो आपने मुझे पूछा.. वो बोला अरे आप तो बुरा मान गई.. शायद आपको मेरे में कुछ डाउट है... खैर कोई बात नहीं.. आप आराम से घर जाइए। .. मैं ऑटो पकड़ी और घर.. अगले दिन फिर वो कॉलेज के बाहर मिला.. फिर से वैसे ही स्वागत किया मेरा, लेकिन आज ले जाने के लिए नहीं पूछा.. मैं फिर अपना ऑटो पकड़ी और घर.. एक दिन अंकिता मेरे से बोली कि “यार बबलू तुम्हें बहुत लाइक करता है.. प्यार करता है वो तुमसे.. तुमसे बात करना चाहता है.. बहुत अच्छा लड़का है.. डॉक्टर है.. अच्छा-खासा कमाता है.. एक स्टेट्स है उसका.. चाहता तो ऐसी कितनी ही लड़कियां मिल जाती उसको.. लेकिन जब से वो तुमको देखा है, बस तेरा ही हो गया है.. तुम्हारे घर की स्तिथि के बारे मैं उसे सब बता चुकी हूँ.. बावजूद वो तुमको बहुत लाइक करता है.. वो मुझे बोला तो मैं तुम्हें बोल रही हूँ.. बॉयफ्रेंड बना लो यार.. बहुत अच्छा लड़का है.. जिंदगी बन जायेगी तेरी।“ .. मैं उसकी बात सुनी और बिना कुछ बोले वहाँ से निकल ली।
मेरे बड़े भैया की STD बूथ थी.. एक दिन उसी में फोन आया.. फोन बबलू ने किया था.. अंकिता ने उसको नम्बर दी थी.. उसने मेरे बारे में उन्हें बताया तो भैया ने बोला कि मैं उसका बड़ा भाई बोल रहा हूँ.. तो उसने अपनी बात रखते हुए ये बात कही कि मुझे आपकी बहन बहुत पसंद है.. और मैं उससे शादी करना चाहता हूँ।। .. भैया ने उसकी बात सुनी और बोले कि मुझे अभी अपने बहन की शादी नहीं करनी हैं.. अभी उसे पढ़ाना है.. और सुनो दुबारा इधर फोन मत करना।
फिर भी वो लगातार कॉलेज के बाहर मुझे बड़े ही डेशिंग मैनर में मुझे हाई-हेल्लो करता.. अब तो धीरे-धीरे हाल-चाल भी पूछना शुरू कर दिया था.. वो जितना पूछता था मैं बस उतना ही ज़वाब देती थी। … अब इस तरह से करीब दो महीने हो गए.. एक बार वो शनिवार को आया और बोला कि “यार तुम बस घर से कॉलेज आओ और कॉलेज से घर जाओ.. यार इसके अलावे भी बहुत कुछ है.. दुनिया बहुत बड़ी है.. उसे देखो यार.. चलो कहीं घूमने सुमने.. क्या बस केवल कॉलेज आना और जाना!!.. अगर आज कुछ प्रॉब्लम है तो कल चले.. कल तो छुट्टी है।“
मेरा पता नहीं क्या हुआ उस दिन, मैं एकदम से उखड़ गई.. मैंने सबके सामने ही उसे सुना दिया.. कि.. “देखो.. तुम होंगे अंकिता और जूही के फ्रेंड.. मैं नहीं जानती तुम्हें.. और न जानना चाहती हूँ.. और नहीं जाना तुम्हारे साथ कहीं भी.. जो तुम्हारे दोस्त हैं उसे ले के जाओ घूमने.. और आइंदा से मेरे पीछे कभी पड़ना भी मत.. बता दे रही हूँ।“ .. मैं गुस्से से बोली और वहाँ से निकल ली।
अगले दिन जब कॉलेज आई तो देखी कि वो,मुन्ना और एक लड़का गेट के बाहर खड़ा हैं.. मैं एकदम से डर गई.. कि पता नहीं मैंने कल गुस्से में क्या-क्या बोल दी, जो आज ये ग्रुप में आ गए.. ये कुछ कर न दे हमें!! .. मैं तुरंत गेट के अंदर आ गई.. अपने एक मैम के पास गई और सब बातें बताई.. फिर मैंने अपने भैया के STD बूथ का नम्बर दिया और भैया को फोन लगाने को बोली.. मैम ने भैया को फोन लगाकर बात बताई और हमें कॉलेज से ले जाने को कही। .. करीब आधे घण्टे बाद ही भैया अपने पूरे दल बल के साथ आये.. और सबसे पहले आ के तो कॉलेज प्रशासन को ही खूब झाड़े.. फिर वो मुझे गेट के बाहर लाये और चेतावनी देते हुए बोलने लगे कि “अगर आज के बाद किसी ने भी मेरी बहन को छेड़ने या आँख उठा के भी देखने की कोशिश की तो यहीं काट के रख दूँगा.. कोई भी माई का लाल अगर अपनी माँ का दूध पिया होगा तो अगली शिकायत मेरी बहन के तरफ से आ जाय.. फिर बताता हूँ।“
भैया के धमकी का तो असर हुआ.. उस दिन के बाद वहाँ वो लड़के दिखे नहीं.. लेकिन जब मेरे भैया लोगों ने छानबीन शुरू की तो पता चला वो तीनों लड़के मुसलमान थे और वो बबलू शादी-शुदा और एक बच्चे का बाप भी था। .. और मैं जब ये बात सुनी तो मेरी पैरों तले जमीन ही खिसक गई.. काटो तो खून नहीं.. जिसे मैं बबलू समझ रही थी दरअसल वो बबलू तो था ही नहीं.. बबलू नाम के पीछे वो एक मुसलमान था और वो तीनों मुसलमान थे ये बात अंकिता और जूही को भी मालूम नहीं था, क्योंकि हमारा परिचय तो एक हिन्दू के तौर पर हुआ था। मैं तो कुछ देर के लिए अचेत सी हो गई थी।। ... लेकिन इन सब के बीच एक बात सच बताऊँ तो मैं भी उसके तरफ झुकने लगी थी.. वो भले ही उस दिन कुछ और रीजन से अपने दोस्तों के साथ आया हुआ होगा लेकिन एक साथ तीन लड़कों को देख के मैं बहुत डर गई थी और मैंने मैम से भैया को फोन लगाने को बोल दी थी। .. एक बात तो थी कि अगर वो अपना परिचय कोई बबलू न बोल के अपना मुस्लिम नाम बताता तो मैं कभी भी उससे बात तक नहीं करती, क्योंकि मेरे घर में ऐसा माहौल है कि इनके प्रति बस घृणा ही घृणा... मम्मी पापा लोग इनकी करतूतें बताते रहते थे.. कुछ दुरी पे ही वासेपुर था.. वहां के भी खूब उदहारण सुनाते रहते थे। .. लेकिन यदि वो उस दिन अपने दोस्तों के साथ न आया होता तो शायद मैं उसके गिरफ्त में आ चुकी थी.. और शायद बबलू के प्यार में ऐसा पड़ती कि जैसा कि आज हमें लव-जिहाद के मामले सुनने को मिलते हैं.. उस वक़्त तो कुछ अता-पता भी नहीं था ई लव-जिहाद के बारे में .. लेकिन वो तब से ही इस मुहिम से जुड़े हुए थे/हैं।। .. खैर मैं तो एक्सीडेंटल और भगवान की कृपा से बच गई लेकिन मेरी जैसी न जाने कितनी भोली-भाली लड़कियां इसका शिकार बन चुकी हैं और अब भी बन रही हैं। .. मेरी आप बीती से अगर मेरी किसी बहन को इससे सतर्क और सम्भलने का मौका मिलता है तो इसे आप जरूर शेयर कीजियेगा।
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हमारी ऊपर की मित्र की आप बीती से इतना तो जान गए होंगे कि ये लव-जिहादी किस कार्य-पद्धति के तहत अपने काम को अंजाम देते हैं। .. किस मनोविज्ञान के तहत काम करते हैं। .. कितना समय देते हैं और कितना पेशेंस रखते है! .. विश्वास हासिल करने के कितने तरीके अपनाते हैं! .. और इधर लड़की सोचती है कि कोई तो है जो मेरी इतनी परवाह करता है, मेरा इतना ख्याल रखता है, मेरे को इतना टाइम देता है.. दिन रात बस मेरे ही पीछे पड़ा रहता है!! .. फिर इन्हें इनका दिल जीतकर प्यार के जाल में इस तरह से गिरफ्त करते हैं कि लड़की बस अंधी हो जाती हैं.. कुछ भी नहीं दिखाई देता इन्हें प्यार के आगे.. परिवार से समाज से बगावत को तैयार हो जाती हैं.. और इनका अंधापन तब तक जारी रहता है जब तक कि इनका निकाह नहीं हो जाता हैं.. और जैसे ही निकाह होता है कुछ महीनों में ही ये एकदम धड़ाम से अर्श से फर्श पे आ के गिरती हैं.. और तब इनकी चीखें सुनने वाला कोई नहीं होता हैं... इसकी आवाजें, सिसकियाँ घर की चाहरदिवारी,बुरके और दिल में ही दफन हो के रह जाती हैं।
तो.. जागो, संभलो और सचेत होओ बहनों।
कुछ बॉलीवुडिया सनीमा की मारी घनघोर सेखुलर लड़कियां जो ये बोलती है कि प्यार-मुहब्बत धर्म-वर्म की दीवार नहीं देखती है तो बेटा तुम अभी नादान हो, या तेरे घर वाले नादान हैं, या तुम कुछ जादे ही पढ़-लिख गई हो.. तेरे में बॉलीवुडिया मुहब्बत का खुमार कुछ ज्यादा छा गया है.. अगर धर्म का ख्याल न रहता तो वे मुन्ना,बबलू,राजू आदि क्षद्म हिन्दू नाम से आगे नहीं आते.. और अगर तुम्हें इन्हीं नामों से इश्क़ भिड़ाना है तो एक बार इन बबलुओं की कम से कम एक ओरिजिनल पहचान पत्र ज़रूर देख ले.. इतनी गुज़ारिश तो मैं कर ही सकता हूँ।
ये जो निकाह के पहले प्यार में अंधी हो के ये जो बोलती हो न कि धर्म-वर्म सब फ़ालतू की बातें हैं,बकवास है, ढकोसला है, प्रेम ही धर्म है, इंसान की इंसानियत देखो धर्म नहीं.. वही तुम बाद में बुरका पहन के बड़े शान से इस्लाम का झंडा बुलन्द कर रही होगी और तुम्हारे बच्चे भारत को इस्लामी मुल्क बनाने के लिए, गज़वा-ए-हिन्द के लिए मस्जिद-मदरसों में खून-पसीना एक कर रहे होंगे।
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गंगवा
खोपोली से।
आंगन
Saturday, April 8, 2017
||लव-जेहाद.. सचेतात्मक !!
||ग्रामीण भारतीय राजनीति और महिलाएं||
माँझी-द माउंटेन मेन.. मेरे सबसे बेहतरीन सिनेमा में से एक.. बीसों बार देख चूका हूँ.. जब भी देखता हूँ तो लगता है कि पहली बार देख रहा हूँ.. गज़ब की सिनेमा और गज़ब का अभिनय.. दृश्य ऐसे कि आँख से आँसू बरबस ही छलक आये।.. हँसाती-गुदगुदाती और जीवन के कठोर सत्य से परिचित कराती ‘माँझी’।
इनके बहुत सारे दृश्यों में एक दृश्य मुझे बार-बार देखने को मज़बूर कर जाती है.. मैं वहाँ वीडियो पाउज करता हूँ और रिवर्स कर फिर से देखता हूँ… दशरथ माँझी जब इंदिरा गाँधी के चुनावी रैली में उनसे भेंट करने जाता है.. और इंदिरा गाँधी जब स्टेज पे होती है और स्टेज का बाँस टूटने को आता है तो किस तरह दशरथ माँझी भागकर बाँस को कंधे से सहारा देता है.. और स्टेज को गिरने से संभालता है.. इस वक़्त नवाज़ की अभिनय देखिये.. मैं बस इस सीन पे पाउज करता हूँ फिर स्टेज टूटने से पहले तक में बैक करता हूँ फिर प्ले करता हूँ.. फिर देखता हूँ.. कंधे से स्टेज को सहारा दिए दशरथ को देखता हूँ.. उसकी पीड़ा को देखता हूँ.. देख के ऐसा लगता कि देखो कैसे दशरथ के कंधे के ऊपर भारत खड़ा है!.. स्टेज के ऊपर भाषण देती इंदिरा गाँधी और तालियों की गड़गड़ाहट से उसका इश्तकबाल करती जनता.. और इधर स्टेज के नीचे स्टेज को सहारा दिए दशरथ माँझी.. ऊपर क्या भाषण चल रहा लोग क्यों ताली बजा रहे कोई मतलब नहीं.. ये तो बस बाँस पकड़े खड़े है।.. भाषण खत्म होने का इंतज़ार कर रहे है और उनसे भेंट कर अपनी बात रखने का।..
इसके बाद बस सिनेमा।
सिनेमा का ये दृश्य आँखों के सामने बरबस ही आया जब यहीं फेसबुक में ही एक मित्र के वाल में एक वीडियो देखा.. वो मित्र पढ़ रहे होंगे तो पता चल जाएगा।..
वीडियो एक रैली की थी.. बहुत सारी भीड़ थी.. बड़े-बड़े बैनर,झंडे,पट्टे,बैच,टोपी,लाऊडस्पीकर,बॉक्स वगेरह-वगेरह.. सबसे आगे-आगे 7-8 गो पुलिस फिर उनके पीछे सवा पाँच किलो के गेंदा के फूल का माला पहने जबरदस्त इस्माइल के साथ हाथ हिलाते नेता जी.. और उनके अगल बगल वाले सवा किलो का माला पहने हुए रोड मार्च कर रहे हैं.. इनके पीछे पुरुषों का हुजूम..,हुजूम के पीछे ढाक-ढोल-ढांसा के साथ झूमर पार्टी.. फिर उनके पीछे बैनर पकड़ी महिलाएं फिर उनके पीछे दो लाइनों में एक पार्टी का झंडा पकड़ी और टोपी पहनी महिलाओं की लम्बी लाइन.. इनकी लाइन के बीचों-बीच में भयंकर चोंगा और सोड़-बॉक्स से लदी टेकर गाड़ी और लाइन के बीचो-बीच में कोड-लेस माइक पकड़े एनोन्सकर्ता जो मुँह में रजनीगन्धा तुबे ओजस्वी आवाज में फलेन्दर महतो जिंदाबाद-जिन्दाबाद के नारे लगा रहा है व कुछ स्लोगन बोल रहा है.. कुछ दुरी बाद एक चाचा जी फूल महुआ टाइट सर पर गमछा बाँधे माइकल जैक्सन जैसी डांस-स्टेप और नाना पाटेकर जैसी आवाज के साथ के ‘फलेन्दर महतो…. जिंदाबाद-जिंदाबाद!” का उदघोष कर रहा है। .. महिलाओं के लाइन के पीछे बाइक-सवार लोग.. ज्यादातर किशोर उम्र के लड़के.. मुँह में गुटखा पेचड़ते और पार्टी के एक झंडे को बाइक के अगली पहिये के शोकअप से बांधे हुए और एक झंडे को मोड़कर कर टाई का रूप दे कर गले से लटकाये हुए तो कुछ कलाई में बाँधे हुए बीच-बचार टाटा-मैजिक में बज रहे खोरठा गाना के साथ ये बाइक सवार लौंडे पी-पो करते बाइक के ऊपर से ही कमरिया लचकाते और थूंकते आगे बढ़ रहे हैं।..
उफ़्फ़.. रैली कुछ ज्यादा हो गई क्या? ..
अब ये रैली आगे तो बढ़ रही थी.. और मैं वीडियो देख रहा था.. लेकिन माउंटेन मैन सनीमा की तरह मेरी नज़र अटक गई महिलाओं की लाइन पर.. एनोन्सकर्ता के ‘फलेन्दर महतो…’ के उदघोष करते ही महिलाओं द्वारा ‘जिंदाबाद-जिंदाबाद..’ की ज़वाब के साथ नारे लगाती और आगे बढ़ती इनकी लाइन।.. मेरी नज़र ठिठक गई इन महिलाओं के ऊपर.. जिंदाबाद-जिंदाबाद का नारा लगा रही महिलाओं के ऊपर.. इनके चेहरों को बड़े गौर से देखने लगा.. इन्हें पढ़ने की कोशिश करने लगा.. जिंदाबाद-जिंदाबाद जब सब एक साथ बोलती हैं तो लगता है कि कोई गीत गा रही हैं.. इनके चेहरों को देखता हूँ फिर सोचने लगता हूँ कि ये नारे क्यों लगा रही हैं?.. क्या इनका इन नारों से कुछ वास्ता हैं? .. पार्टी का टोपी पहने और हाथ में झंडा थामी क्या इन्हें पता है कि ये क्यों इसे पहनी और पकड़ी हुई हैं?.. ऐसी महिलाएं ज्यादातर हैं जो हरेक जिंदाबाद कहने के बाद शरमाकर हँसती हुई लुगा के घुगा से अपना चेहरा ढँक लेती हैं!.. कोई कोरा में बच्चा लिए,हाथ में झोला पकड़े तो कोई घुगा को संभालती हुई आगे बढ़ रही हैं.. इन्हें बस यही पता कि ये कोई रैली है और वे इस भीड़ की हिस्सा मात्र.. जिसका रैली के उद्देश्य से कोई लेना-देना नहीं.. बस शामिल है तो शामिल है।..
सब कोई एक बड़का मैदान में जमा होते हैं..वहाँ शानदार स्टेज सजी होती है.. लोड़िसपीकर और चोंगा गनगना रहे होते हैं.. सब महिलाएं पालथी मार कर बैठ जाती हैं हाथ में झंडा पकड़े.. कुछ देर में मैन नेता जी और उसके सुपुत्र जो कि कर्मठ,शिक्षित और जुझारू युवा नेता है अपने 10-12 स्कार्पियो और बोलेरो के काफिले के साथ मैदान में एंट्री मारते है।.. एंट्री मारते ही एनोन्सकर्ता इत्ती जोश-खरोश के साथ ‘ढिकेंद्र प्रसाद’ जिंदाबाद-जिंदाबाद के नारे लगाता है कि उसका चबाया हुआ रजनीगन्धा का चूरन जबड़ों से बाहर आ होंठों को सुशोभित करने लगता हैं.. महिलाएं तो बस किसी नाम सुनना है नहीं कि उनके मुखारबिंद से जिंदाबाद-जिंदाबाद स्वतः ही प्रस्फुटित होने लगते हैं।..
नेता जी स्टेज पे आते है और भाषण शुरू होता है.. महिलाएं अजीबोगरीब तरीके से नेता का मुँह ताकती हैं.. घुगा संभालती और ठुड्डी से हाथ सटाये.. बड़े शांतचित हो के नेता जी का भाषण सुनती हैं.. नेता जी कभी-कभी उग्र हो जाते तो महिलाओं पे कुछ ख़ास असर नहीं लेकिन नेता जी के चेलों-चमाटों द्वारा तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ढिकेंद्र परसाद जिंदाबाद-जिंदाबाद के नारे लगाते ही महिलाएं हरक़त में आ जाती हैं और हाथ उठाकर जिंदाबाद-जिंदाबाद करने लगती हैं। … माइकाधीन नेता जी फुफकारते हुए सरकार को चेताते है और हाथ उठाते हुए ‘ढिकाना सरकार’.. बोलता है तो सारी महिलाएं ‘जिंदाबाद-जिंदाबाद’ का नारा लगा देती हैं.. नेताजी और पुरुष लोग हैरान-परेशान.. ये क्या बोल दी हमारी माताएं-बहनें?!.. चोलेसर महतो आता है और बोलता है.. “आंय गो.. तोहनी तनी सुइन लेबा ने कि जिंदाबाद बोले के लगय ने मुर्दाबाद!!.. तोहनी केकरो नाम सुना न है कि जिंदाबाद-जिंदाबाद करे ला शुरू केर देहा!”
एक माता जी,”सेटा हमनी के की मालुम गो चोलेसरा!!.. तोहनी बतेबे नाय करला कि केकरा मुर्दाबाद बोलो हथीन आर केकरा जिंदाबाद से.. हमनी के तो बस जिंदेबाईद आवो है।“
“अच्छा छोड़ा.. अब से जेटा हम बोलबो ने सेटा तोहनी दोहरिहा.. ठीक!”
अब नेताजी के सुपुत्र युवा नेता जी आते है और गरीबी-शोषण-जुल्म-शिक्षा के ऊपर खूब भाषण झाड़ते है और खूब तालियां बटोरते हैं.. चोलेसरा के द्वारा कहने पे ताली पीटती महिलाओं का ताली सुनकर युवा नेता जी और भी जोश और उत्साह से लबालब हो उठते है.. और बोलते है “अगर इसी तरह से हमारी माताओं और बहनों का साथ रहा तो इस क्षेत्र और इस राज्य से गरीबी और अशिक्षा का नामोनिशान मिटा दूँगा।“.. फिर चोलेसरा के इशारे पे महिलाएं खूब ताली बजाती हैं और जिंदाबाद-जिंदाबाद के नारे लगाती हैं।
रैली खत्म,सभा खत्म,मुद्दा खत्म!! ..
सब अपने-अपने घर और अपने-अपने काम में लग जाते हैं…
नेता जी अपनी स्कार्पियो,बोलेरो,दसचकवा,हाईवा,ट्रक,होटल आदि का कारवाँ बढ़ाने लग जाते हैं.. और उनके चेला चमाटी कुंआ,डोभा,श्मशान घाट, सामुदायिक भवन आदि में ठेके के जुगाड़ में।
लेकिन इनकी रैलियों में जो महिलाएं और पुरुष(महिला वर्ग वाले ही) तालियां पीट रहे होते हैं वे क्या करने लग जाते हैं?
कोई चुंवा से पानी ढो रही हैं.. कोई केन्दु पत्ता बेच रही हैं.. कोई सखुआ पत्ता बेच रही हैं.. कोई लकड़ी बेच रही हैं.. कोई मिट्टी लिप रही हैं..हड़िया बना रही हैं.. इनके बच्चे होटलों में काम कर रहे हैं तो स्कूल केवल खिचड़ी खाने जा रहे हैं.. इनके मरद लोग कहीं पी-पा पड़े हुए हैं तो कोई मुम्बई-दिल्ली की सड़कों पे धूल फांक रहे हैं।..
इनके चेहरों को देखिये.. इनको पढ़ने की कोशिश कीजिये.. फिर पता चलेगा कि अपना भारत कहाँ खड़ा है? .. और कितना आगे बढ़ रहा हैं??
काश हमारे सर्वेसर्वा नेतागण और उनके सुपुत्र गण इनकी तालियों की गड़गड़ाहट सुनने के साथ-साथ इनके चेहरों को भी पढ़ पाते!!
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जय हिन्द
गंगवा
खोपोली से।
||बॉलीवुड और मुस्लिम||
बॉलीवुड.. भारतीय सिनेमा की फैक्ट्री.. विश्व भर में नाम।।
सिनेमा के बारे में कहा जाता कि सिनेमा समाज का दर्पण है.. जहाँ समाज सिनेमा रूपी दर्पण में अपने-आप को झाँकता है।.. मतलब कि जो समाज में घटित होता है सिनेमा उसे परदे पर उतारता है.. लेकिन मामला हमें कुछ उल्टा ही लगता है.. अब सिनेमा ऐसा है कि जिसे समाज अंगीकार कर रहा है.. मतलब कि समाज की रूप रेखा अब ये सनीमाएं तय कर रही है।
फैशन से लेकर रहन-सहन, चाल ढाल और विचार तक अब सिनेमा निर्धारित कर रही है।
खैर छोड़िये…
बहुत सारी ऐतिहासिक और बायोपिक फिल्में बनी हैं.. लेकिन क्या वो ऐतिहासिक फिल्में अपनी मूल रूप में रही हैं? .. या फिल्मों के माध्यम से बड़ी चतुराई और कुटिलता के साथ एक विशेष विचारधारा को फलित-पोषित करने का काम किया गया हैं और किया जा रहा हैं(अब तो और भी तेज़ गति से).
मुग़ले-आज़म (विस्तृत पोस्ट के लिए आनंद राजाध्यक्ष जी का वाल देखे) से लेकर तमाम अंडरवर्ल्ड की पृष्टभूमि पे बनी फिल्में।
फिल्मों के गाने राम,प्रभु,भगवन,ईश्वर से कब मौला-मौला में विलीन हो गए पता भी न चला.. पीर-फ़क़ीर-मौलवी सब के सब शुद्ध आत्मा और दूध से धुले हुए वहीँ हिन्दू साधू-संत-पुजारी सब के सब व्यभिचारी,लुटेरे और बलात्कारी।
समाज पे इसका असर क्या पड़ा ?? .. हम खुद कभी इसमें शामिल थे.. सभी साधू-संतों को एक ही तराजू में तौलने का काम.. किसी को भी पोंगा-पंथी और ढोंगी का तमगा लगा देते थे और पुरे आत्मविश्वास के साथ लगाते थे।.. लेकिन बात उठती है कि हममें ये विश्वास आया कहाँ से ? .. बहुत सिम्पल सा ज़वाब है, फिल्में और पत्रिकाएं!!.. और मेरे जैसे तो थोक के भाव में मिल जाएंगे!!
सुल्तान मिर्ज़ा को पता नहीं कितने जन जानते थे लेकिन ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुम्बई’ के बाद बहुत जन जानने लगे.. दाऊद के ऊपर तो कितनी मुवियाँ बन चुकी हैं… और अब ये ‘रईस’… ये चाहे कितने कुछ क्यों न रहे हो लेकिन सिनेमेटोग्राफी और दमदार डायलोगों ने इन्हें नायक बना कर पेश किया गया … याद है जब हम भी कभी वो ‘मूँछ कट” रखे थे, तो सब ने एक ही स्वर में ये कहा था “अरे वाह भाई सुल्तान मिर्जा.. डॉन लग रहे हो भाई!” .. पता नहीं बता नहीं सकते जब कोई डॉन कहता तो कितनी ख़ुशी मिलती थी।… वहीँ राम-राम,ॐ नमः शिवाय लिखी शर्ट और माला पहनने और खरीदने से पहले हज़ार बार सोचते थे।.. क्यों भला ? .. क्योंकि ऐसे वस्त्र पहने सिल्वर स्क्रीन पर लोग लालची,ढोंगी और लुटेरे होते हैं।.. और जब ये पहन के बाहर निकलो तो कोई ये लेबल आपके मत्थे पे न चिपका दे!!.. सो बाबा इन सब से दूर ही रहो!!
सिनेमा के माध्यम से जो हमारे घृणा के पात्र थे उसे सॉफ्ट और हीरो बनाकर पेश किया गया.. और जो सही में हमारे हीरो थे जिन्होंने हमारी रक्षा के लिए अपने को बलिवेदी पे चढ़ा दिया उसे न तो इतिहास में नामजद किया गया और न परदे पे कभी या बख़ूबी उतारा गया.. और जिसे उतारा भी गया तो उसे एक अलग एंगल के साथ.. जिससे कोई प्रेरणा लेने वाली बात ही नहीं।.. या ये कहे कि सिनेमा के माध्यम उसके प्रताप को मलिन किये जाने का काम किया गया।
इन्हें पेश इस तरह से किया गया कि सामने वाले की कोई गलती ही न हो.. और ये खुद दोषी हो!!
अब तक जिस वे में सिनेमा बनती आ रही है अगर इसी तरह से सिनेमा कुछ सौ वर्ष बाद बनेंगे तो कैसा रहेगा? .. कल्पना कीजिये.. बाला साहेब ठाकरे, असुदुद्दीन औवेसी और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर.. इन पर किस तरह की मूवी बनेगी और किस तरह से पेश किया जाएगा?
सोचिये.. सोचने में क्या जाता है!!
हमारे जो हिन्दू योद्धा थे वे किनके विरुद्ध लड़े थे? .. ये बताने में लोगों की बुद्धिमत्ता डगमगाने क्यों लगती हैं?..
मुहम्मद बिन क़ासिम,महमूद ग़ज़नवी,मुहम्मद गौरी,बाबर,अकबर,औरंगजेब,चिश्ती,नादिरशाह.. डॉट..डॉट.. ये सब अपने कौम के लिए हीरो हैं.. इन्हें बखूबी पढ़ाया भी जाता है और गुणगान भी किया जाता है।.. लेकिन हमारे योद्धा जो इनके विरुद्ध लड़े उन्हें हमारी कौम कितना जानती हैं? .. गौरी के सतरहवें आक्रमण को ही ज्यादा क्यों पढ़ते हैं? .. इससे पहले जिन योद्धाओं ने उसे ज़बरदस्त पटखनी दी उसके बारे में हम कितना जानते हैं?... मुहमद बिन क़ासिम के सिंध आक्रमण के बाद करीब 250 साल तक कोई विदेशी आक्रांता सिंध से आगे नहीं बढ़ पाया.. क्यों भला? .. बिन क़ासिम के सिंध आक्रमण के बाद वे कौन योद्धा थे जो उन्हें सिंध से आगे नहीं बढ़ने दिए?!... इनके बारे में हमें क्या जानकारी हैं? .. ऐसा क्यों है कि हम केवल उनके विजय के ही बारे में पढ़ते हैं और अपने राजाओं के परास्त के बारे में.. और ऊपर से ये शिगुफा छोड़ दिया जाता कि हमने तुमपे 1000 साल हुक़ूमत की है!! .. अरे भइये किधर हुक़ूमत की है?? .. मात्र इस वाक्य की वज़ह से ही न जाने कितने मानसिक गुलाम बन गए और अपनी दासता स्वीकार कर ली!!
ऊपर उल्लेखित विदेशी मुस्लिम(ये शब्द को जोर देकर ही लिखना पड़ेगा) आक्रान्ता के बारे में हम अच्छी तरह जानते है .. लेकिन क्या हम निम्न योद्धाओं के बारे में इतना जानते हैं..
1.हरी सिंह नलवा
2.मिहिरभोज
3.राणा कुम्भा
4.सूरजमल
5.गुरु तेगबहादुर.. और भी डॉट.. डॉट..
कितना जानते है हम इनके बारे में?? … कितनी जगह मिली है इन्हें इतिहास के पन्नों में और कितनी मुवियाँ बनी है अब तक इनके ऊपर.. या कौन इनके ऊपर मूवी बनाने की सोच रहा ? ..
सच तो ये है कि इनके वास्तविक सवरूप पे कोई मूवी बनाने कि हिमाकत ही नहीं करेगा और कोई करेगा भी तो इन्हें लम्पट बना के पेश करने का काम करेगा .. काहे ? .. काहे कि शेखुलरिता पे आँच नहीं आनी चाहिए बन्धु.. समझ रहे हो न!! .. गंगा-जमुनी तहज़ीब भी कोई चीज है भैया!! .. इन्हें संरक्षित कौन करेगा भैया!!
विदेशी मुस्लिम आक्रांता और गुंडे मवाली रोल मॉडल के रूप में स्थापित किये जा रहे हैं वहीँ हमारे ‘हीरो’ जिनके बलिदान और शौर्य के चलते आज हम अपने को ‘हिन्दू’ कह पा रहे हैं वे ‘लम्पट’ बना के पेश किये जा रहे हैं या तो कुछ पढ़ाया या बताया भी नहीं जा रहा हैं।
ज़रा सोचिये... हमारी आने वाली पीढ़ियां बाला साहेब को हीरो मानेगी या ओवैशी को?
फिल्मकार,साहित्यकार,इतिहासकार.. सब के सब प्रबुद्ध जन.. कुछ उधर से भी और बहुत कोई कुछ इधर से भी.. उधर वाले तो अपनी प्रबुद्धता बखूबी अपनी कौम से समर्पित ही लगाये और लगातार पूरी निष्ठा से लगा रहे हैं. लेकिन हमारे इधर के प्रबुद्ध जन अपनी प्रबुद्धता उन्हें खुश करने और चाटुकारिता में लगा दी और लगा रहे हैं।
अब वक़्त है कि इन चाटुकारों को उनका मुआवजा पूरी सूद समेत वापिस की जाय.. जहाँ भी मौका मिले।
गंगवा
खोपोली से।