बॉलीवुड.. भारतीय सिनेमा की फैक्ट्री.. विश्व भर में नाम।।
सिनेमा के बारे में कहा जाता कि सिनेमा समाज का दर्पण है.. जहाँ समाज सिनेमा रूपी दर्पण में अपने-आप को झाँकता है।.. मतलब कि जो समाज में घटित होता है सिनेमा उसे परदे पर उतारता है.. लेकिन मामला हमें कुछ उल्टा ही लगता है.. अब सिनेमा ऐसा है कि जिसे समाज अंगीकार कर रहा है.. मतलब कि समाज की रूप रेखा अब ये सनीमाएं तय कर रही है।
फैशन से लेकर रहन-सहन, चाल ढाल और विचार तक अब सिनेमा निर्धारित कर रही है।
खैर छोड़िये…
बहुत सारी ऐतिहासिक और बायोपिक फिल्में बनी हैं.. लेकिन क्या वो ऐतिहासिक फिल्में अपनी मूल रूप में रही हैं? .. या फिल्मों के माध्यम से बड़ी चतुराई और कुटिलता के साथ एक विशेष विचारधारा को फलित-पोषित करने का काम किया गया हैं और किया जा रहा हैं(अब तो और भी तेज़ गति से).
मुग़ले-आज़म (विस्तृत पोस्ट के लिए आनंद राजाध्यक्ष जी का वाल देखे) से लेकर तमाम अंडरवर्ल्ड की पृष्टभूमि पे बनी फिल्में।
फिल्मों के गाने राम,प्रभु,भगवन,ईश्वर से कब मौला-मौला में विलीन हो गए पता भी न चला.. पीर-फ़क़ीर-मौलवी सब के सब शुद्ध आत्मा और दूध से धुले हुए वहीँ हिन्दू साधू-संत-पुजारी सब के सब व्यभिचारी,लुटेरे और बलात्कारी।
समाज पे इसका असर क्या पड़ा ?? .. हम खुद कभी इसमें शामिल थे.. सभी साधू-संतों को एक ही तराजू में तौलने का काम.. किसी को भी पोंगा-पंथी और ढोंगी का तमगा लगा देते थे और पुरे आत्मविश्वास के साथ लगाते थे।.. लेकिन बात उठती है कि हममें ये विश्वास आया कहाँ से ? .. बहुत सिम्पल सा ज़वाब है, फिल्में और पत्रिकाएं!!.. और मेरे जैसे तो थोक के भाव में मिल जाएंगे!!
सुल्तान मिर्ज़ा को पता नहीं कितने जन जानते थे लेकिन ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुम्बई’ के बाद बहुत जन जानने लगे.. दाऊद के ऊपर तो कितनी मुवियाँ बन चुकी हैं… और अब ये ‘रईस’… ये चाहे कितने कुछ क्यों न रहे हो लेकिन सिनेमेटोग्राफी और दमदार डायलोगों ने इन्हें नायक बना कर पेश किया गया … याद है जब हम भी कभी वो ‘मूँछ कट” रखे थे, तो सब ने एक ही स्वर में ये कहा था “अरे वाह भाई सुल्तान मिर्जा.. डॉन लग रहे हो भाई!” .. पता नहीं बता नहीं सकते जब कोई डॉन कहता तो कितनी ख़ुशी मिलती थी।… वहीँ राम-राम,ॐ नमः शिवाय लिखी शर्ट और माला पहनने और खरीदने से पहले हज़ार बार सोचते थे।.. क्यों भला ? .. क्योंकि ऐसे वस्त्र पहने सिल्वर स्क्रीन पर लोग लालची,ढोंगी और लुटेरे होते हैं।.. और जब ये पहन के बाहर निकलो तो कोई ये लेबल आपके मत्थे पे न चिपका दे!!.. सो बाबा इन सब से दूर ही रहो!!
सिनेमा के माध्यम से जो हमारे घृणा के पात्र थे उसे सॉफ्ट और हीरो बनाकर पेश किया गया.. और जो सही में हमारे हीरो थे जिन्होंने हमारी रक्षा के लिए अपने को बलिवेदी पे चढ़ा दिया उसे न तो इतिहास में नामजद किया गया और न परदे पे कभी या बख़ूबी उतारा गया.. और जिसे उतारा भी गया तो उसे एक अलग एंगल के साथ.. जिससे कोई प्रेरणा लेने वाली बात ही नहीं।.. या ये कहे कि सिनेमा के माध्यम उसके प्रताप को मलिन किये जाने का काम किया गया।
इन्हें पेश इस तरह से किया गया कि सामने वाले की कोई गलती ही न हो.. और ये खुद दोषी हो!!
अब तक जिस वे में सिनेमा बनती आ रही है अगर इसी तरह से सिनेमा कुछ सौ वर्ष बाद बनेंगे तो कैसा रहेगा? .. कल्पना कीजिये.. बाला साहेब ठाकरे, असुदुद्दीन औवेसी और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर.. इन पर किस तरह की मूवी बनेगी और किस तरह से पेश किया जाएगा?
सोचिये.. सोचने में क्या जाता है!!
हमारे जो हिन्दू योद्धा थे वे किनके विरुद्ध लड़े थे? .. ये बताने में लोगों की बुद्धिमत्ता डगमगाने क्यों लगती हैं?..
मुहम्मद बिन क़ासिम,महमूद ग़ज़नवी,मुहम्मद गौरी,बाबर,अकबर,औरंगजेब,चिश्ती,नादिरशाह.. डॉट..डॉट.. ये सब अपने कौम के लिए हीरो हैं.. इन्हें बखूबी पढ़ाया भी जाता है और गुणगान भी किया जाता है।.. लेकिन हमारे योद्धा जो इनके विरुद्ध लड़े उन्हें हमारी कौम कितना जानती हैं? .. गौरी के सतरहवें आक्रमण को ही ज्यादा क्यों पढ़ते हैं? .. इससे पहले जिन योद्धाओं ने उसे ज़बरदस्त पटखनी दी उसके बारे में हम कितना जानते हैं?... मुहमद बिन क़ासिम के सिंध आक्रमण के बाद करीब 250 साल तक कोई विदेशी आक्रांता सिंध से आगे नहीं बढ़ पाया.. क्यों भला? .. बिन क़ासिम के सिंध आक्रमण के बाद वे कौन योद्धा थे जो उन्हें सिंध से आगे नहीं बढ़ने दिए?!... इनके बारे में हमें क्या जानकारी हैं? .. ऐसा क्यों है कि हम केवल उनके विजय के ही बारे में पढ़ते हैं और अपने राजाओं के परास्त के बारे में.. और ऊपर से ये शिगुफा छोड़ दिया जाता कि हमने तुमपे 1000 साल हुक़ूमत की है!! .. अरे भइये किधर हुक़ूमत की है?? .. मात्र इस वाक्य की वज़ह से ही न जाने कितने मानसिक गुलाम बन गए और अपनी दासता स्वीकार कर ली!!
ऊपर उल्लेखित विदेशी मुस्लिम(ये शब्द को जोर देकर ही लिखना पड़ेगा) आक्रान्ता के बारे में हम अच्छी तरह जानते है .. लेकिन क्या हम निम्न योद्धाओं के बारे में इतना जानते हैं..
1.हरी सिंह नलवा
2.मिहिरभोज
3.राणा कुम्भा
4.सूरजमल
5.गुरु तेगबहादुर.. और भी डॉट.. डॉट..
कितना जानते है हम इनके बारे में?? … कितनी जगह मिली है इन्हें इतिहास के पन्नों में और कितनी मुवियाँ बनी है अब तक इनके ऊपर.. या कौन इनके ऊपर मूवी बनाने की सोच रहा ? ..
सच तो ये है कि इनके वास्तविक सवरूप पे कोई मूवी बनाने कि हिमाकत ही नहीं करेगा और कोई करेगा भी तो इन्हें लम्पट बना के पेश करने का काम करेगा .. काहे ? .. काहे कि शेखुलरिता पे आँच नहीं आनी चाहिए बन्धु.. समझ रहे हो न!! .. गंगा-जमुनी तहज़ीब भी कोई चीज है भैया!! .. इन्हें संरक्षित कौन करेगा भैया!!
विदेशी मुस्लिम आक्रांता और गुंडे मवाली रोल मॉडल के रूप में स्थापित किये जा रहे हैं वहीँ हमारे ‘हीरो’ जिनके बलिदान और शौर्य के चलते आज हम अपने को ‘हिन्दू’ कह पा रहे हैं वे ‘लम्पट’ बना के पेश किये जा रहे हैं या तो कुछ पढ़ाया या बताया भी नहीं जा रहा हैं।
ज़रा सोचिये... हमारी आने वाली पीढ़ियां बाला साहेब को हीरो मानेगी या ओवैशी को?
फिल्मकार,साहित्यकार,इतिहासकार.. सब के सब प्रबुद्ध जन.. कुछ उधर से भी और बहुत कोई कुछ इधर से भी.. उधर वाले तो अपनी प्रबुद्धता बखूबी अपनी कौम से समर्पित ही लगाये और लगातार पूरी निष्ठा से लगा रहे हैं. लेकिन हमारे इधर के प्रबुद्ध जन अपनी प्रबुद्धता उन्हें खुश करने और चाटुकारिता में लगा दी और लगा रहे हैं।
अब वक़्त है कि इन चाटुकारों को उनका मुआवजा पूरी सूद समेत वापिस की जाय.. जहाँ भी मौका मिले।
गंगवा
खोपोली से।
Saturday, April 8, 2017
||बॉलीवुड और मुस्लिम||
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भैया इरफान खान के जाने का तुम्हारा दुख इतना कि मेरे लिखने पर फेसबुक से ब्लॉक करके भाग लिए। दोहरा व्यक्तित्व क्यों ? किसको उल्लू बना रहे हो?
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