Saturday, April 8, 2017

||बड़ा कारहा केर के अइले है!||

“बड़ा कारहा केर के अइले है”
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संजेया 11 बजे सुबह-सुबह पसीने से लथपथ कन्धे में NNN का ट्रैक सूट लटकाये और उँगलियों से MI का मोबाइल टेपियाते हुए आँगन में प्रवेश करता है और तुलसी पीड़ा के पास खड़ी खटिया को धड़ाम से पटकते हुए बिछाता है और पसर जाता है.. लेटे-लेटे ही मोबाइल स्क्रीन में नज़र गड़ाये संजेया मैया को सूखे गले से आवाज लगाता है.. “मैया… ऐ मैया… मैया~~गे~~~ .. एक लौटा पानी दे ने गे.. बड़ी जोर पियास लागल है गे।“
मैया तो नहीं थी लेकिन आजी जिरिया देवी ढबवा में बैठ के ओल छिल रही थी.. ओल छिलते-छिलते ही आजी गुस्से से कहती है.. “हाँ.. बड़ा  कारहा केर के अइले है ने जे पियास लाइग गेल हो आर नरटिया सुखाय लागल हो!! … हम ऐते अजवाइर(खाली) नाय हियो जे तोरा पानी दिये पारबो.. टड़िया में जाय के पांच घण्टा किरकिटिया खेले में तो मोरन नाय लागो हो.. घरवा आय के पनिये पिये में मोरन लागे लागो हो.. अपने लौटा उठा आर टेंईड़ ले!”.
“आयं गे आजी.. एक लौटा पानी खातिर हमरा ऐते सुनाय देली गे… आर ई ‘कारहा करना’ की भवे हे गे.. जे रोज-रोज बस अहे उदाहरणवा देते रहो ही!?”.
“तोहनी की जानबे रे कारहा कर हाल आर मरम.. तोहनी तो बस बैट आर खूंटी ले के टंड़िया में उमक आर किरकिट खेल..!”
“भक्क्क् गे.. तोय आपन कारहा आपने पास राख.. अभी 12 बजे से कटघरा से मैच है जिबो खेलाय ले.. 50 टका दिहो बारजी राखबय।“
“हाँ बेटा खूब खेल.. आर धोनिया बन।“.
संजेया पानी पीता है खाना खाता है और आजी से पचास टका लेता भी है और फिर किरकिट खेलने निकल पड़ता है.. मैं भी किरकिट का शौक़ीन.. खेलता तो न के बराबर.. लेकिन लौंडों के साथ ज़रूर जाता हूँ.. संजेया हमसे लगभग आधी उम्र का है.. भतीजा लगता है.. संजेया कन्धे में बैट लटकाये और बबलगम चबाते हुए मेरे साथ और दू जन भोलू और मिंटू के साथ कटघरा जा रहा है.. रस्ते में चलते-चलते बल्ले को घुमाते हुए कभी कवर शॉट लगाता है तो कभी हूक शॉट तो कभी अपर कट.. और कभी डिफेंसिव। .. कुछ देर आगे चलने के बाद संजेया पूछता है..
“चाचू ई कारहा क्या होता है? … जब देखो तब आजी मैया सब बस यही बोलते रहती है कि ‘बड़ा कारहा केर के अइले है जे थइक गेले”.. ई कारहा करना कितना बड़ा काम होता था जो आदमी इतना थक जाता था?!”.
हम जरुआ(नदी) के पास ही एक खेत के मेढ़ से पास हो रहे थे.. मैंने बोला..
“ये खेत देख रहे हो!?”
“हाँ.. चाचू!”
“ये कैसे बना होगा ?”
“JCB से बनाया होगा.. (तनिक ठिठोली करते हुए)”
“आज से 50-60 साल पहले या उससे भी पहले क्या JCB थे?”
“नहीं चाचू.. हम तो जब से देखते आ रहे है ये खेत ऐसे के ऐसे ही है.. और नए खेत में तो JCB ही देखते है।”
“वो बात ठीक है.. लेकिन कभी न कभी तो ये पहली बार खोदे तो गए ही होंगे न!.. ऐसा थोड़े न है कि भगवान खेत बना के दे दिए हो!”
“हाँ तो फिर कौन बनाया.. ?”
“तुम्हारे हमारे बाप दादाओं ने आजाओं ने… और किसकी मदद से बनाया वो मालुम है?”
“किसकी मदद से ?”
“यही कारहा के मदद से… हालाँकि कारहा केवल अकेला यन्त्र नहीं था.. गैंता,कौड़ी,छैनी भी थे.. लेकिन माटी काटकर उसे साइड में लाना और मेढ़ का रूप देना ये ‘कारहा’ से किया जाता था.. कारहा को बैल खींचते थे लेकिन कारहा को हैंडल करना और मिट्टी को दबा के रखना ये बहुत मेहनत और मुश्किल भरा काम होता था… इसलिए जब कोई खेत से कारहा कर के घर आता था तो एकदम से थका-हारा होता था.. और अपनी माँ या फिर बीवी से बोलता था ‘ऐ गे फलनी माय बड़ी थइक गेलियो गे कारहा करते-करते.. सरीरवे तनिको जान नाय बुझाय लागल हो गे.. तनी एक लौटा पानी पियाय देय। .. तब घर की औरतें पुरे सेवा भाव से अपने पति या फिर बेटे की सेवा करती थी… लेकिन वहीँ कहीं कोई निठल्ला सा हो.. कोई काम-धाम न करता हो लेकिन घर पहुँच कर थकने का बहाना कर पानी पीने को माँगता था तो घर की महिलाएं कहती थी ‘हाँ बड़ा कारहा केर के अइले है ने जे थइक गेलय हे’. .. तो इसकी शुरुआत यहाँ से हुई थी।“
“ओह अच्छा अइसन बात चाचू … अच्छा चाचू आप कारहा किये है??”
“हाँ किये है.. लेकिन हैंडल कभी न पकड़ा है.. क्योंकि उस काबिल था भी नहीं मैं... मैं बस मिट्टी दबाने और बैल को सोंटने का काम करता था और रोकने का..  मेरे घर जो कुँआ है न उसके माटी को पुरे बारी में कारहा के माध्यम से ही फैलाये थे और समतल किये थे।“
“ओह.. लेकिन अब हमनी के भाग्य में कारहा नाय चाचू.. अब हमनी के जमाना में तो JCB हो।“
“हाँ भतीज.. अब हमनी मोडर्न जे भे गेलय है ने..!”
इतने में ही हम ग्राउंड पहुँच जाते है… टॉस होता है और किरकिट चालू.. मैं भी 100 रुपया का बारजी लगा देता हूँ।..

लेकिन मैं उस दिन एक किनारे पे बैठ के बचपन के दिन याद करने लग जाता हूँ.. मेरे पिताजी,बड़े पापा जी और आजी क्या-क्या बोलती थी..
पापा तो पढ़ने-लिखने के पक्षधर थे ही नहीं कभी… हर वक़्त जमीन व माटी काटने की बात करते रहते थे.. खेत खाड़ने की बात,पहाड़ी धाँसने की बात.. माटी कोड़-कोड़ के पेट पालने की बात.. वगेरह-वगेरह.. नाम लिखना सीख गए और कुछ गिनती पहाड़ा और हिसाब लगाना सीख गए तो हो गई अपनी पढ़ाई-लिखाई... अब छोड़ो ई सब और खेती बारी में लग जाओ। .. जब धान काट के मेसना सुखाना हो जाता था तो रोज सुबह कारहा निकालो और खेत की ओर चल पड़ो और खेत की साइज़ बढ़ाओ या फिर नया खेत ही खाड़ना शुरू कर दो.. वैसे नये खेत खाड़ना ‘माँझी’ लोग ज्यादा करते थे.. ‘चौका’ के हिसाब से माटी काटते थे.. एक चौका मतलब पाँच हाथ लम्बा और पाँच हाथ चौड़ा.. चौके के हिसाब के लिए प्रत्येक चौके में एक टीला छोड़ दिया जाता था.. बाद में ज्यादातर घर के सदस्य ही कारहा के माध्यम से खेत को समतल करते थे और मिट्ठी से आर बाँधने का काम।.

पहले तो पूरी अर्थव्यवस्था कृषि पे ही निर्भर थी.. प्रकृति पे ही आश्रित थे.. प्रकृति जितना दे उतने में ही संतुष्ट रहते थे.. माँ-बाप एक कर्तव्य और जिम्मेदारी से बंधे होते थे.. उनके बच्चे आगे कैसे सर्वाइव करे इसकी चिंता करते थे.. अगर वर्तमान में माँ-बाप के पास परिवार चलाने जितनी खेत है तो अपने तीन या फिर चार संतानों के लिए खाने-पीने की व्यवस्था के बारे में सोचते थे.. और खाने-पीने की व्यवस्था मतलब खेत-बारी.. तो उनके पास वैसी जमीन जिसपे कि खेत न बने हो उसपे सभी भाई और पिताजी सुबह-सुबह कारहा,कुल्हाड़ी,गैंता,कौड़ी ले जा के नया खेत खाड़ने के काम में लग जाया करते थे.. और जब सब कारहा करके थके हारे घर आते थे तो गृहणियां पुरे मनोभाव के साथ सेवा करती थी.. आखिर करे भी क्यों न बच्चों के भविष्य को लेकर काम जो कर कर घर आये हैं।

एक बार मेरी आजी झुनिया देवी बता रही थी.. “मालुम है जेटला बाबू.. उ जो बघमरवा वाला खेतवा है न वहाँ पहाड़ी थी.. तोर बुबा(दादा जी) आर हमर तीनों बेटा सब मिल के उ खेत खाड़ा है.. एक बार तोर बुबा वहाँ के टीला को धाँस रहे थे तो वहाँ एगो गोहमन साँप था.. जैसे गैंता से टीला धाँसे न तो गोहमन संपवा फुफकारले बाहर निकला और तोर बुबा को डंस लिया.. बुबा वहीँ गैंता फेंक के चिल्लाने लगे.. तोर बड़का गुंगु तुरन्त अपना धोती फाड़ के रटरटा के गोड़ को बाँध दिया और बुबा को एके उठान में सीधा घर ले आये.. जैसे ही हम तोर गुंगु को बुबा के कन्धा में लदा देखे न हम सब हड़िया-पतरा फेंक के बाहर दौड़ते हुए आये और बोलने लगे.. “आयं रे विजेया की भे गेलय रे बप्पा के रे?”
गुंगु बोले “मैया! बप्पा के लते(लत) छु लेलय गे!” (जब कोई सांप काट लेता था तो साँप काटना नहीं बोलते थे, लत छु लिया ऐसा बोलते थे।)
“कौन लते छू लेलय रे?”
“गोहमन लगले मैया.. “.
“हाय गे काली मईया.. गोहमन छू लेलय हमर विजेया बप्पा के गे माय।… ऐ सुकरा जल्दी जाय के चिड़नी बाप के बुलाय के लान रे.. देखी ने रे बप्पा कइसन लरुवाय लागल है रे.. जल्दी जो रे..”
तोर बप्पा(शुकर महतो) दौड़ के जाता है और चिड़नी बाप को बुला के लाता है.. चिड़नी बाप आ के फिर बिष झाड़ना शुरू करता है.. हम उसी टेम काली मईया से भेड़ा गछते है कि हे काली मइया हमर विजेया बाप के कोनो नाय हवे के चाही,तोरा हम जोड़ा भेड़ा चढ़इबो… और तब काली मइया के किरपा से आर चिड़नी बाप के मन्त्र से बिष उतर जाता है।.. तो ई सब केकर खातिर बेटा.. तोहनिये खातिर ने!.. एक बार आर तोर बुबा के लते छूलो आर हुवा कोय नाय रहल के कारण हमेशा छोइड़ के चलिए गेलथुन।.. आईझ हमीन के पास जेतना भी जमीन है उ सब तोहरे बुबा आर परबुबा सब के मेहनत के कारण हो।.. तोहनी जोत-कोड़ के अच्छे से खा आर बस(वंश)आगे बढ़ा।
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आज इस ‘कारहा’ ने कितने कुछ आँखों के सामने ला दिया… जिस कारहे के बदौलत आज हमारे इतने बड़े-बड़े खेत हैं.. हमारी जीविका चल रही है.. हमारी अर्थव्यवस्था का आधार है उसे आज की पीढ़ी जानती भी नहीं है।.. खेत खाड़ने में कितनी चोटें लगी.. साँपों के बिछुओं के कितने असहनीय डंक झेलने पड़े.. बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अकाल काल के मुँह में समा गए.. वहीँ इनके बच्चे अब खेती करने से कतराने से लगे हैं.. उनके द्वारा खाड़े गए खेत में क्रिकेट खेलने तक लग गए हैं..  अगर इन्हें ‘कारहा’ का मौल पता होता तो ज़रूर सोचते.. लेकिन कारहा अब केवल कहावत में ही सिमट कर रह गया है।
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खैर छोड़िये…
जब शाम को पुनः किरकिट खेल के वापिस आये और प्यास के मारे अंगना में बैठ के नयकी भौजी से पानी मांगे तो नयकी भौजी भी मुँह ऐंठते हुए बोली “बड़ा कारहा केर के अइले है ने जे नरटिया सुइख गेलो हो!”
☺😃😊😃
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गंगवा
खोपोली से।

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