Saturday, April 8, 2017

||मुख्यमंत्री के नाम पत्र||

सेवा में,
           श्री मान मुख्य मंत्री महोदय, झारखण्ड
विषय – ‘ताश’ को राजकीय खेल घोषित करने हेतु सुझाव पत्र।
           महाशय जोहार,
                                 माननीय मुख्य मंत्री जी … हमर नाम गंगवा है.. झारखण्ड प्रदेश के बोकारो जिले के नावाडीह प्रखण्ड का एक जागरूक नागरिक हूँ। .. सुनल है कि झारखण्ड में राजकीय खेल के ऊपर मत्थापच्ची चेल रहा है। .. तो हमरा एक आम झारखण्डप्रदेशी होवे के नाते कर्तव्य बनता है कि हम भी कुछ सहायता करे इसमें ... तो एकरे खातिर हम एगो सुझाव देना चाहते है। .. हम चाहते है कि ‘ताश’ को राजकीय खेल घोषित किया जाय।.. काहे कि एकर में जो करेज है उ बाकी कर खेल में बिल्कुल नय है। .. अइसन जूनून आर जज्बा आर कोनो खेल में नय है साहेब। .. की बाल-बुतरू,छौड़ा-जवान आर की बूढ़ा .. सब कोय पूरे लग्न आर पेशन के साथ ताश खेलत हैं। ..  की गर्मी,की लू,की बरसात,की जाड़ा आर की बसन्त, बारो महीना चौबीस घण्टा एकदम सदाबहार.. बिना बेरोक टोक कंटिन्यू बारो मास चालू। .. गंजी में,जंघिया में, फुलपेंट में, लुंगी में, जिनिस में,कोट में,टाय में सब में सब कोय लगल रहता हैं.. की गरीब आर की अमीर,की जोल्हा,की कुर्मी,की बनिया,की तेली,की कोयरी,की तुरी,की हाड़ी,की रजवार आर की माँझी.. सब कोय एके पतिया में बैठ के ताश फेटत रहता हैं। .. सच कहे साहेब तो ई एके गो ऐही खेल रहता है जहां जाइत-पाइत आर धरम-वरम नय देखा जाता हैं .. सामाजिक समरसता आर एकजुटता तो इहे खेल में देखने को मिलता हैं साहेब।
                                                की नदी-नाला,पहाड़-पहाड़ी,बाँध-पोखर,रोड-कुल्ही,ढाबा-भितरा,नीचु-छत्ता,गाछ-पतार,झाड़-झुरमुट.. सब जगह सब दने आदमी सब कोकचइले रहता है साहेब। .. आदमी भूख पियास आर बीवी तक को छोड़ देता है ई ताश खेले के जूनून के कारण। .. गीदर-बुतरू आर छौवा सब इस्कूल नागा कर देता है चाहे इस्कूल से भाईग के महुआ गाछे के तरे या फिर पुटुस-परास के गजारे के भीतर घुइस के ताश खेलता हैं। भले ही दुपहरिया का खाना नय खायेंगे लेकिन टुंगरिया में चेढ़ के ताश जरूर खेलेंगे। .. एक बेर रमेसरा मैया के लुगा के अचरा से पैसा चोरी केर के बोरवा कोचा में ताश खेल रहा था.. उसकी मैया को पता चेल गिया.. उसकी मैया बसफराठी(बांस का फटा डंडा) ले के बोरवा कोचा पहुँच गई और जो बसफराठी का माइर रमेसरा को पड़ा था कि क्या बताये साहेब, निरेन महीना में कपार फट गिया था रमेसरा का उ बसफराठी के माइर से… मैया कान उठक-बैठक कराई थी कि अब से ताश नहीं खेलेंगे करके.. लेकिन अगले दिन रमेसरा एकदम से अनिल कुंबले के जइसन कपार में पट्टी बांधकर महुआ बेच के ताश खेलने पहुँच गिया था।.. तो  ई होता है खेल के प्रति जूनून साहेब। .. खैंटा तुरी आपन सीसीएल का कटल पैसा ताश में लगा दिया लेकिन बेटी का ब्याह नहीं कराया, ई होता है जूनून साहेब। .. सन्तना रोद(धुप) को रोद नहीं गिनता है साहेब .. सेकिल उठाता है और कोयला बेच आता है फिर ताश में लग जाता है.. एक दिन पैसा घटा तो आपन सेकिलये को बंधिक रख दिया था साहेब.. सन्तना तो खैर आपन सेकिलये रखा था लेकिन बहुत कोय तो आपन हीरो-होंडा,मारुती,और टेक्टरो तक बन्धिक रख देता है साहेब। .. एक बेर बिसेसर महतो लड़खड़ा के बेहोश हो गिया.. केतनो पानी मारा गिया लेकिन होश नहीं आया, फेर बिरसैया तुरी जब कान के सामने जा के ताश फेटे न तो तुरन्त ही अँखिया खुल गिया था साहेब। .. इसे कहते है खेल के समर्पण आर जूनून साहेब।
जहाँ कहीं भी तनिको मौका मिलता है वहां गमछा आर पेपर बिछा के शुरू हो जाते हैं.. जहाज,ट्वेंटी नाइन,अल्टा-पलटा,कॉल ब्रेक,तीन पत्ती,सात पत्ती आर पता नहीं का-का ताश के प्रारूप खेलना शुरू हो जाते हैं। .. किरकिट खेल रहे हैं तो जब तक आपन बेटिंग का टेम न आये तब तक दू-चाइर हाथ तशवा में अजमा लेते हैं। .. शादी-बिहा,लगन-तिलक में गए तो जब तक खाने की बारी न आये तब तक तशवा में हाथ फेर लेते हैं.. केतना बार तो आदमी खेबो नहीं करता है साहेब। .. जब तक महुआ नहीं गिर जाता है तब अल्टा-पलटा गाछे के तरे चलता रहता है साहेब। .. कोय आदमी कोलवरी से कारी से लेटाय-झेटाय के आता है आर रस्ता-डहर में कहूँ ताश पार्टी मिल जाता है तो पहले दूँ-चार हाथ भाइंज लेता है फिर नहाने को जाता है साहेब।... केतना आदमी तो अइसन है कि जबतक कान में ठीकरी,लाल पान,चिड़िया,काला पान नहीं सुनाई देता है तब तक पेट का भात नहीं पचता हैं साहेब।… ई खेल के जूनून अइसन है साहेब कि जहां भी दू-चाइर गो आदमी एक साथ दिख गया बइठल तो समझ जाइए कि वहां कुछ हो या न हो लेकिन ताश जरूर खेला जा रहा होगा!! ..
जहाँ गीदर-बुतरू सब बड़कल का रिजेक्टेड ताश से आम-कोयर,जामुन,एक टका,दू टका का खेल खेलता है वहीँ बड़का लोग हजार-बजार और गाड़ी-घोड़ा का खेल खेलता है साहेब। … राजनैतिक रैली-सैली में भी लोग लोग रोडवे पे गमछा बिछाय के शुरू हो जाते हैं।

कहना चाहता हूँ कि इस खेल के प्रति दीवानगी,जूनून और समर्पण के आगे कोई भी खेल आमने-सामने भी नहीं फटकता है साहेब। ..  कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जिसकी पहुँच से ये खेल दूर होगा और इसके दाँव-पेच नहीं जानता होगा!!.. एक ठेठ गाँव-देहात से लेकर हाई-क्लास सोसायटी तक में इसके दीवाने हैं,हर उम्र और हर वर्ग के लोग!!

                                   अतः श्रीमान से विनम्र अनुरोध है कि इस खेल की आम जन में लोकप्रियता व स्वीकार्यता को ध्यान में रखते हुए इसे राजकीय खेल घोषित करने की दिशा में सार्थक निर्णय लें। 

जय जोहार
जय झारखण्ड!
                        
भवदीय
गंगवा महतो
एक ताश प्रेमी, बोकारो झारखण्ड से।

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