एतवार का दिन है .. सुबह के 8 बज रहे है .. सन्नू ठाकुर उम्र 50 पार अपनी पुरानी हरक्यूलस साइकिल से शनिचर महतो के घर को आते है .. हैंडिल में टंगे अपने झोले को निकालते हुए घर में प्रवेश करते है.. प्रवेश करते ही आवाज लगाते है ‘ऐ हो महतो जी .. कंदे(किधर) है हो !?’ .. शनिचर महतो जिन्हें CCL से रिटायर हुए 6 साल हो गए है खटिया में बैठ के चाय पी रहे है .. खटिया में बैठे-बैठे ही सन्नू ठाकुर को बोलते है .. “आवा..आवा ठाकुर जी आवा!! .. ऐ मिंटू माय तनिक एक कप चाह (चाय) ठाकुर जी खातिर भी लाय दो तो!” .. कुछ देर बाद मिंटू माय एक कप चाय ला के देती है .. चाय पीने के बाद सन्नू ठाकुर अपने झोला में से अपना शेविंग का औजार निकालते है और शनिचर महतो से बोलते है “आवा महतो जी.. दढ़िया बना देते है!” .. शनिचर महतो आवाज लगाते है “ऐ मिंटू माय.. तनिक एक डुभी(कटोरा) पानी आर दढ़िया वाला क्रीमिया लाय के दीहो!” .. मिंटू माय सब ला के देती है.. सन्नू ठाकुर चेहरे में क्रीम पोत के शनिचर महतो का दाढ़ी बनाते है। .. शनिचर महतो का पोता मिंटू जो अभी 8वीं कक्षा में पढ़ रहा है वहीँ खटिया में बैठ के टेम्पल रन गेम खेल रहा है .. अपनी दाढ़ी बनवाने के बाद शनिचर महतो मिंटू से बोलते है, “बाबू मिंटू. तोरो चुल्हिया(बाल) बैढ़ गेलो हो रे बाबू.. तनिक छंटा लो.. अच्छा नहीं लग रहा है!” .. मिंटू बाबू गेम पॉज कर के बोलता है “वो बाबा .. मैं यहाँ बाल बनाऊंगा !? .. कभी नहीं .. ई जैसे-तैसे काट देगा.. हम तो मकोली वाले सैलून में ही बनाएंगे.. मुझे नहीं बनाना यहाँ!”
“जाय सरवा.. जहाँ मन करो हो हुवा बना … ऐ सबतिरी माय.. आय तनिक नोह टुंगाय ले तोय!” ..
सावित्री देवी आती है अपना नाख़ून कटवाती है। ..
सन्नू ठाकुर और शनिचर महतो फिर खटिया में बैठ के कल आज और कल के ऊपर चर्चा करने लगते है ..
एक लम्बी आह भरते है शनिचर महतो बोलते है .. “बस हमनी के ही पीढ़ी भर ठाकुर जी.. एकर बाद तो ई जजमानी सब नाय रहतो।“
“हाँ महतो जी .. लगता तो यही है .. हमरो बेटा नाती सब अब ई सब नय करने खोजता है .. जमाना बदल गया है महतो जी.. अब हमारे बच्चों को ई सब में लाज आने लगा है .. हमारे बच्चे जजमानी नहीं करना चाहते तो वहीँ आपके बच्चे भी घर में बाल दाढ़ी बनाना नहीं चाहते!”
“हाँ ठाकुर जी.. जमाना तो बड़ी चेंज हो गया है.. समस्या दोनों तरफ से है .. खैर छोड़िये.. जब तक हमलोग बचल है आपन बूढ़ा-पुरखा के द्वारा चलल गेल व्यवस्था के बनाय के रखते है.. एकर बाद तो बस भगवाने मालिक।“
“हाँ महतो जी .. हम भी बस यही सोच के आते हैं.. हमें भी मालुम है कि अब बस गिनल-चुनल लोग ही दाढ़ी और बाल बनवाते है हमसे.. लेकिन हम तो केवल आपलोगों के चलते आते रहते हैं.. जो हमारे बाप-दादाओं ने चलाया, जिसके चलते हमारा पालन-पोषण हुआ.. हमारे बाल-बच्चों का हुआ.. अभी भी कुछ हद तक हो रहा है वो हम ऐसे कैसे छोड़ दे? .. आज हमारा लड़का लोग का सर्विस लग गया है.. नाती-पोता सब बढ़िया इस्कूल में पढ़ने लगा हैं.. अब उ लोग ऐसे-कैसे करेगा जजमानी.. अब हमारा जजमानी बस हमारे भर ही महतो जी.. एकर बाद तो कुछो नाय बचेगा!”
“हाँ ठाकुर जी .. लेकिन हमलोग जब तक बचल है.. परम्परा बनाये रखेंगे.. एकर बाद जो होगा सो होगा!”
“हाँ महतो जी .. अच्छा ठीक महतो जी अब हम पूरन महतो घर जाते हैं.. पिछला हफ्ता भेंटाये नहीं था.. ई बार दाढ़ी नहीं बनाये तो बहुत बयायेगा!”
“ठीक है ठाकुर जी जाइए!”
सन्नू ठाकुर वहाँ से अपना साइकिल उठा पूरन महतो के घर की ओर चल देता है .. कमोबेश पूरन महतो के घर भी यही हाल रहता हैं।
अभी कुछ दिन पहले ही सन्नू ठाकुर अपने साल भर के जजमानी का धान ले के गया हैं।
नाई की तरह ही कुम्हार,लोहार और ब्राह्मण भी अपना जजमानी ले के गये हैं।
लेकिन ये अंतिम पीढ़ी है जो ये व्यवस्था ले के चल रही है जिसको उसके पूर्वजों ने कभी शुरू किया था।
हम महतो लोग मूलतः कृषक हैं.. कृषि कार्य को सुचारु रूप से चलाने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई थी.. हमारे कृषि औजार के बनाने और सनाने के काम के खातिर हर एक दो गाँव में लोहार सब को कुछ जमीन दे के बसाया गया. . इसी तरह मिट्टी के बर्तन हेतु कुम्हार को.. बाल-दाढ़ी बनाने हेतु नाई को और पूजा पाठ हेतु ब्राह्मण को बसाया गया।
ये साल भर अपनी सेवाएं देते और फसल हो जाने के बाद अपनी मेहनताना जजमानी के रूप में ले के जाते। .. गाँव की अर्थव्यवस्था इनके आपसी सहयोग से ही आगे बढ़ती थी और फलती-फूलती थी.. आपसी सामन्जस्य और निर्भरता ही गाँव को जोड़े रखती थी.. और सामाजिकता को प्रगाढ़ करती थी.. आपसी सम्बन्ध को और भी गहरा बनाने के लिए ‘सहिया’ और ‘फूल’ लगाये जाते थे। एक सामाजिक ताना-बाना बहुत मज़बूत हुआ करता था।
आज की पीढ़ी सहिया और फूल क्या होते हैं बता भी नहीं पायेंगे।
आज हम आधुनिक हुए जा रहे हैं.. मोडर्न हुए जा रहे हैं.. पैसों की मारामारी हैं.. पैसे की रेस ने सामाजिकता को बहुत पीछे छोड़ दिया हैं.. अब गाँव और समाज क्या परिवार ही टूटते जा रहे हैं।.. पैसा और आधुनिकता भारतीय ताने-बाने की संरचना को दिनों-दिन ध्वस्त करते जा रही हैं। .. आपसी निर्भरता और सहयोग केवल पैसा और फायदा तय कर रहा हैं इसमें अपनापन और सामाजिकता जैसी कोई भावना नहीं रह रही हैं।
कहने को तो हम विकसित हो जाएंगे.. आधुनिक हो जाएंगे.. मोडर्न हो जाएंगे.. इंडियन बन जायेंगे लेकिन ‘भारतीयता’ की तिलांजलि देकर।
(बहुत गौर करने लायक ये भी बात है कि जिन चीजों को हम छोड़ रहे हैं मने कि बिजनेसवाइज उसे कौन सा वर्ग हाथों-हाथ अपना रहा हैं!? .. और उसकी सामाजिक संरचना क्या कहती है!?)
गंगवा
खोपोली से।
Saturday, April 8, 2017
||ग्रामीण व्यवस्था||
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