||जियोग्राफी वाली प्रेमिका को लभ लेटर||
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मेरी प्रिय सुंदर वन की डेल्टा
किलीमंजारो रीना. 💓💗💝💘
सूरज उत्तरायण में था, मौसम में तबदीली होने लगी थी, समुद्रीय क्षेत्र में उच्च दाब का क्षेत्र बन रहा था, महासागरीय हवाएँ स्थल की ओर चलने लगी थी और इन्हीं हवाओं के संग मैंने बाबा जुकरबर्ग की कृति फेसबुक के माध्यम से आपको फ्रेंड रिकवेस्ट भेजा था. ये ‘दक्षिण-पश्चिम ग्रीष्मकालीन’ मानसून हवाएँ जब आपके मैदानी इलाकों में संघनित हो झमाझम बारिश कराने लगी थी तब आपने हमारा फ्रेंड रिकवेस्ट एक्सेप्ट किया था।.. और जैसे ही आपका hi का मेसेज आया था तो मैं एक छोटे से बादल फटने के साथ-साथ भूकम्प से गुजरा था जिसका रिक्टर स्केल पैमाना 9.7 था।.. फिर मैंने अपने आप को जैसे तैसे सम्भाला था और आपको रिप्लाई देना शुरू किया था।.. और फिर मानसून भर कड़कती बिजलियों के बीच, बादलों की गड़गड़ाहट के बीच,बारिश की झंझावतों के बीच,अलग-अलग वायुमण्डलीय दाबों के बीच फेसबुक के मेसेंजर से होते हुए व्हाटसएप और फोन तक पहुँचा था। और इसी क्रम में पता चला कि आप भूगोल में Ph.D कर रही है।.. तो मेरा टेक्निकल मिस्त्री दिल विभिन्न वायुमण्डलीय दाब को झेलता हुआ उष्ण, उपोष्ण,समशीतोष्ण कटिबंधीय वर्षा वनों से गुजरने लगा था.. जज्बातें दिल की ज्वालामुखी से दहकती लावा की भाँति निकल रही थी.. मिलने की तड़प ऐसी जैसे उच्च वायुदाब से निम्न वायुदाब की ओर बहने को व्याकुल ‘ध्रुवीय पवनें’।.. खैर पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.5 डिग्री झुकी हुई 1610 किलोमीटर प्रति घण्टा की रफ़्तार से घूमती रही और जब आपके दिल का सूरज दक्षिणायन हुआ तो आपने मुझे मिलने के लिए बुलाया.. मैं मारे ख़ुशी के अरब सागर की आद्रिय हवाओं को हृदय में समेट कर आपके पठारी इलाकों की ओर ‘कैटरीना’ की भाँति कूच किया था । .. और आपके हृदय के निम्न दाब क्षेत्र में पहुँचते ही शीतलता पा संघनित हो सैलाब में परिवर्तित हो गया था, और उसी सैलाब में हम दोनों ने दिल के नाव बना के छोड़े थे जो दशम फॉल में जा के गिरा था।.. आपकी सौंदर्य की प्रशांत महासागर में मैं बेकार में ही गहराई थामने का असमर्थ प्रयास कर रहा था।..
“देखा जो हुस्न आपका, तबियत भूकम्पीय हो गई
आँखों का था कुसूर और ज्वार-भाटा दिल में चल गई”.
आभा मण्डल ऐसे जैसे सौर मण्डल.. आँखों की गहराई ऐसे जैसे पूरा कैस्पियन झील समा जाय.. आँखों के बीचों बीच घना काला फिर मध्यम काला और फिर उसके बाद सफेद ऐसे लग रहा था जैसे पृथ्वी की सियाल, सीमा और नीफे की परतें.. आँख के भौ ऐसे जैसे एण्डीज की पर्वतमाला, गाल ऐसे जैसे सबाना के घास के मैदान, गाल के डिम्पल ऐसे जैसे समुन्दर में चक्रवात, ललाट ऐसे जैसे सहारा का रेगिस्तान, कानों की बालियां ऐसे जैसे पृथ्वी की परिक्रमा वृत्त, नाक ऐसे जैसे सार्वभौमिक विशाल प्लेट-विवर्तनिक शक्तियों के कारण उत्पन्न हुई हिमालय.. होंठ ऐसे जैसे भ्रंशन से बनी ब्लॉक पर्वत और रिफ्ट घाटी.. बाल रेशमी ऐसे जैसे असम के चाय के बगान, लम्बी ऐसी जैसे नील नदी और घनी ऐसी जैसे उष्ण कटिबंधीय वर्षा वन.. तुम्हारे बालों का एक लट माथे से होती हुई गाल को पार करती हुई और होंठ को छूती हुए दूसरे गाल में ऐसे टच हो रही है जैसे उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर जाती देशान्तर रेखा और लग ऐसे रही है जैसे भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती हुई स्वेज नहर.. और उसको अपने नाज़ुक हाथों से उठा के अपने कान के नीचू ऐसे रखती हो जैसे अमेजॉन नदी को उठा के हिमालय की तराई में पटक दे रही हो.. दाँत ऐसी चमकीली जैसे ध्रुवीय प्रदेशों के बर्फाच्छादित क्षेत्र.. बोली ऐसी मीठी कि जैसे सुपीरियर झील का पानी। और मीठी बोली मेरे दिल को ऐसे चिरती और छेदती जैसे क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन ओजोन लेयर को.. . गुस्से से गाल ऐसे लाल होते जैसे सुवाड़वाग्नि से गर्म होती लाल सागर। चाल ऐसी जैसे पछुआ पवन और तपिश ऐसी कि किसी को भी लव का लू लग जाय।.. नीली ड्रेस और सफेद चुनरी में ऐसे लगती हो जैसे अंतरिक्ष से खींचा गया पृथ्वी का फोटो।
बस यही लगता है कि तुमको सामने बिठा के पूरा ब्रह्माण्ड और भूगोल पढ़ता रहूँ… दो घण्टे की जुदाई भी ऐसे लगती है जैसे उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में बिताये गए दो दिन और दो रात।… अब हम उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में नहीं रहना चाहते, जल्दी से 0 डिग्री अक्षांश विषुवत रेखा की ओर शिफ्ट होना चाहते है।
बस तुम अपने बड़े भाई ‘दीर्घ ज्वार’, छोटे भाई ‘सक्रिय ज्वालामुखी’ और बापू ‘आग्नेय चट्टान’ को कण्ट्रोल में रखने की कोशिश करना और मुझपर हमेशा प्यार की ‘कपासी मेघ’ की बारिश करवाती रहना।
बस जल्दी से अपना Ph.D पूरा करो और डॉक्टर बनो (हम अपनी दादी और नानी का इलाज करवाने तुम्हारे ही पास लाएंगे) और हमारे जीवन की ‘ज्वार-भाटा’ बनो।
अब जब ये खत लिख रहा हूँ तो रात हो गई है, ‘स्थलीय समीर’ बह रही है.. और इन्हीं के हाथों मैं ये खत पोस्ट कर रहा हूँ.. तुम अपना ज़वाब ‘समुद्रीय समीर’ के हाथों भिजवा देना।
बस अब और क्या लिखूँ ..
“आये हो मेरी ज़िन्दगी में ‘मौसम’ बनकर,
अब बस यूँ ही रह जाओ ‘जलवायु’ बनकर’'.।।
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लभ जू किलीमंजारो 💘💘
तुम्हारा टॉर्नेडो
गंगवा। :)
Friday, January 6, 2017
||जियोग्राफी वाली प्रेमिका को लभ लेटर||
||जे महिषासुर||
आज से तीन हज़ार साल बाद ..
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दुनिया बहुत बदल चुकी है.. टेक्नोलॉजी अपने चरम पे है.. इन तीन हज़ार साल के दौरान कितनी ही सभ्यताएं आई और गई.. कितनी ही जातियां-प्रजातियां विलुप्त हुई और नई बनी.. एक नई पहचान के साथ खुद को ढाला.. तो कुछ ऐसे भी हैं जो अपने को अभी तक उसी हालत में रखा है जैसा कि तीन हज़ार साल पहले थे.. लेकिन संख्या में बहुत कम है.. कारण कि इन्होंने बदलती दुनिया और धर्म के साथ सामन्जस्य नहीं बिठाया.. लेकिन फिर भी अपने अस्तित्व को जैसे-तैसे बचाये हुए हैं.. अपने पूर्वजों से मिली शिक्षा-दीक्षा को अब तक पकड़े हुए हैं.. हालाँकि ये तीन हज़ार साल पहले बहुत ही सम्पन्न थे.. हर लिहाज़ से.. दुनिया में इनकी तूती बोलती थी.. लोग थर-थर काँपते थे इनके नाम से.. लेकिन समय की मार ने इनके स्वर्णिम काल को आज तीन हज़ार साल बाद विलुप्त के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है.. इनके जो निकटतम सगे-सम्बन्धी थे वे ज़माने के साथ अड्जस्ट हो गए और इतने समय अंतराल के बाद अपने इतिहास को विस्मृत कर बैठे.. जो लोग इनके विलुप्त होने के कारक थे उन्हीं के खेमे में ये शामिल हो गए। लेकिन जो मूल से जुड़े रहे उन्हें मुख्य धारा में आने नहीं दिया गया.. मज़बूरन ये लोग शहरों से जंगलों की ओर पलायन कर गए.. लेकिन जैसे-जैसे दुनिया दिनों-दिन छोटी होती गई वैसे-वैसे ये जंगल वासी मुख्य धारा में आने लगे.. इन्हें पढ़ने-लिखने का अवसर मिलने लगा.. यूनिवर्सटियों में इन्हें दाखिला मिलने लगा.. तो ये फिर से अपने मूल को ढूँढ़ने लगे.. वर्तमान में उपलब्ध तमाम साहित्य और इतिहास को खंगालने लगे.. और अपने पूर्वजों का जोर शोर से महिमामण्डन करने लगे.. और उन्हीं पूर्वजों में से सबसे परम प्रतापी विश्व ख्याति प्राप्त जिससे सारी दुनिया खौफ खाती थी उसकी महिमा गाये जाने लगी.. इस वक़्त तक इस प्रतापी पुरुष की मेजोरिटी द्वारा सार्वजनिक तौर पे बहुत ही मज़म्मत की जाती थी.. लानत भेजी जाती थी.. सार्वजनिक जगहों पे इसके पुतले बना के लोग उसके ऊपर गोलियों की बौछार करते थे फिर उसको जला डालते थे.. और ये प्रत्येक साल होता था.. ये कार्यक्रम एक बहुत बड़े उत्सव के तौर पे मनाया जाता था.. इतना बड़ा कि इस दौरान सारे सरकारी उपक्रम बन्द होते थे.. मने नेशनल हॉलीडे।.. लेकिन इनके बचे खुचे लोगों ने अपने नायक को फिर से जगाना शुरू कर दिया .. मेजोरिटी समाज द्वारा की जा रही कार्यक्रमों का विरोध करने लगे.. इनके इस काम में अब इनके जो भाई बिछुड़ गए थे और धोखे से मेजोरिटी वाले खेमे में चले गए थे वे भी इनके पक्ष में खुल के आने लगे.. और इनकी आवाज बनने लगे.. चूँकि ये मेजोरिटी के हिस्सा थे तो इनकी हैसियत अच्छी-खासी थी.. बौद्धिक तौर पे भी और सामर्थ्य के तौर पे भी। .. तो ये अपने नायक का इतिहास खोदन चालु कर दिए.. और जैसे-जैसे इतिहास पता चलता गया.. वैसे-वैसे ये अपने नायक की पूजा करने लगे.. और इनकी शुरुआत अपने शीर्ष के यूनिवर्सिटी से किये.. और ये यूनिवर्सिटी थी “इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ बग़दाद”.
और इन सब का नायक था ‘अबु बकर अल बग़दादी’. जी हाँ बगदादी.. ISIS का संस्थापक और सरगना।
इनके कबीले के लोग शुरुआती दिनों में ISISian कहलाते थे फिर कालान्तर में ये ISian हुए.. और फिर तब से लेकर आज तक ये ‘आइसियन’ ही रहे.. आइसियन की तूती बोलती थी दुनिया में.. हर कोई आइसियन का नाम सुनते ही थरथराने लगता था.. हलक सुख जाती थी.. इनका इलाका इराक,सीरिया और टर्की व अफ़ग़ानिस्तान के कुछ हिस्से हुआ करते थे.. लेकिन इनके सरगना के मरते ही ये अस्तित्व की लड़ाई लड़ने लगे.. जिन शहरों पे ये राज करते थे इन शहरों से इन्हें खदेड़ दिया गया और इन्हें टिगरिस नदी के किनारे मोसुल इलाके के घने जंगलों की ओर जाने को मज़बूर कर दिया गया। ये अपनी बनी बनाई शहरों को छोड़कर जंगलों में बस गए लेकिन अपनी अस्मिता याने ‘आइसियनपन’ के साथ समझौता नहीं किये।.. आज भले ही वो अपने अस्तित्व को ले के जूझ रहे है लेकिन उन्हें गर्व है कि उन्होंने अपना आइसियनपन को ज़िंदा रखा है.. और आज तो आलम ये है कि इनके बिछड़े भाई भी इनका खूब साथ देने लगे है.. शहरों से इनके पढ़े-लिखे इंटेलेक्चुअल्स इनके जंगल जा रहे है और जानकारी इकट्ठा कर रहे है.. और बड़ी-बड़ी मैगज़ीनें उनके नाम से छपी जा रही है.. दुनिया के जिस भी इलाके से उसकी कोई जानकारी मिलती है तो तुरंत अपडेट करते है और मेजोरिटी समाज को गरियाते हुए अपने नायक का गुणगान करते है।
एक बहुत बड़ी पत्रिका लिखती है कि..
“आज जहाँ पुरे विश्व में और विशेष कर इराक और सीरिया में आइसियन अबु बकर अल बगदादी का पुतला गोलीमार होता है और जश्न मनाया जाता है और उसको मारने वाले को पूजा जाता है वहीँ कुछ ऐसे भी समाज है जहाँ इनको पूजा जाता है और इनका शहादत दिवस मनाया जाता है।.. अभी हम टिगरिस नदी के किनारे बसे मोसुल इलाके के जंगल वाले हिस्से में है.. यहाँ के लोग बगदादी को अपना पूर्वज मानते हैं और उनके शहीदी के दिन को मातम के रूप में मनाते हैं। हमारे साथ आइसियन समाज के अल-बल-हर-बकर-बगदादी आइसियन है जो आज हर जगह अपनी बात मज़बूती से रख रहे है... आइये इनसे बात करते है..
“ज़नाब अल-बल-हर-बकर-बगदादी जी बताइये कि आइसियन कौन हैं और अबु बकर अल बगदादी कौन थे?”
“आइसियन एक बहादुर और लड़ाका समुदाय था.. जिसमें विश्व भर के बेहतरीन लड़ाके थे.. दूर दराज के मुल्क से IS में भर्ती होने के लिए लोग आते थे.. हम दुनिया में डोमिनेंट होती अमेरिकी हुक़ूमत के विरुद्ध खड़े हुए थे... और उनके खिलाफ जम के लड़े थे... हमारा नायक ज़नाब अबु बकर अल बगदादी था.. उनके कुशल नेतृत्व में हमने सामंतवादी अमेरिकी शक्तियों के खिलाफ जम के लड़ाई लड़ी थी... हमारी हुक़ूमत पुरे इराक और सीरिया में चलती थी.. हमारा बगदादी बहुत ही न्यायप्रिय और मानवतावादी बादशाह था.. हम दुनिया पे राज करने वाले कौम थे… लेकिन बाहरी घुसपैठिये अमेरिकियों ने धोखे और छल से हमारे बादशाह को मार गिराया और हमारी सत्ता को हथिया लिया और हमें आइसियन कह-कह के ज़लील किया जाने लगा और हमें जंगलों की तरफ रुख करने को मज़बूर किया गया।.. हमारे पास उस समय दुनिया की सबसे आधुनिक हथियार थी.. सबसे ट्रेंड सेना थी.. बेहतर टेक्नीशियन, इंजीनियर और डॉक्टर थे.. लेकिन बगदादी के इंतकाल होते ही हमें इन सब चीजों से महरूम होना पड़ा।
“अच्छा ये बगदादी के मृत्यु के ऊपर जो उत्सव होते है उसपे आपके क्या विचार हैं?”
“ये सरासर गलत है और नाजायज है.. किसी के शहीदी के ऊपर जश्न और उत्सव मानना किसी भी तरीके से उचित नहीं है.. कोई भी सभ्य समाज इस तरह का उत्सव नहीं मना सकता... हम इसकी मज़्ज़्मत करते है.. हम आइसियन समाज इस दिन को मातम के तौर पे मनाते है… और हमारी माँग है कि इस उत्सव को मनाना बन्द किया जाय।“
“तो ये थे अल-बल-हर-बकर बगदादी! … जिनका साफ़ कहना है कि हम आइसियन हैं और बगदादी हमारे पूर्वज थे.. और उनके मृत्यु के ऊपर किसी भी प्रकार का उत्सव नहीं मनाना जाना चाहिए।“
बाहरी घुसपैठिये सामंतवादी अमेरिकियों ने धोखे से हमारे न्यायप्रिय बादशाह का क़त्ल करवाया और हमारी जल,जंगल,ज़मीन और सत्ता छीनी.. और हमें लगातार शोषण किया गया.. हमारे शांतिप्रिय,न्यायप्रिय और मानवता के रक्षक बादशाह को बहुत ही क्रूर और पापी बना के दुनिया के सामने प्रदर्शित किया गया और उनके शहादत को ये बाहरी अमेरिकी उत्सव के तौर पे मनाने लगे.. लेकिन अब हम मूलनिवासी बहुत सह लिए.. बहुत कर लिया हमारे मूलनिवासी परम प्रतापी बादशाहों का अपमान.. अब और नहीं चलेगा.. सारे बाहरियों को मार-मार के अमेरिका भेज देंगे।
उस वक़त जितनी भी मीडिया थी सब के सब अमेरिकियों के कब्ज़े में थी.. सो उन्होंने हमारे मानवतावादी बादशाह बगदादी को अपने मनमाने तरीके से और अपने फायदे के लिए विलेन और क्रूर बना के पेश किया.. उनको नकारात्मक बना के उसपे ढेरों बुक्स और फिल्में बनाई… लेकिन ये सिर्फ इनलोगों का प्रोपेगेंडा था.. और ये प्रोपेगेंडा भला कितना दिन चलना था! .. एक न एक दिन तो सब बाहर आना ही था.. और जैसे-जैसे हम मूलनिवासी आइसियन पढ़-लिख रहे हैं इनके प्रोपेगेंडा की परतें दिन प्रतिदिन खुलती जा रही है।
अभी कुछ दिन पहले भारत की उस समय की मशहूर अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक प्रतिलिपि मिली है जिसमें साफ़ लिखा गया है कि ISIS के लोग बहुत ही भले और अच्छे लोग थे। जब हमारे मानवतावादी बादशाह बगदादी बाहरी आतताइयों अमेरिकियों के खिलाफ युद्ध लड़ रहे थे तब यहाँ नौकरी के सिलसिले में भारत से आई औरतों को सकुशल उनके मुल्क वापिस भेजा गया था. . और तब उन औरतों ने कहा था कि जैसी छवि ISIS की बनाई और दिखाई जा रही है.. वैसा बिल्कुल भी नहीं है.. वे बहुत ही नेकदिल और अच्छे इंसान हैं.. हमारे खाने पीने से लेकर ट्रांसपोर्ट तक का खूब ख्याल रखा गया था।“
हमारे बादशाह कोई ज़ाहिल इंसान नहीं थे.. वो उस टाइम के Ph.D होल्डर थे। .. और हम आइसियन लोग इतने ही बुरे थे तो दुनिया भर से लोग क्यों आते भला हमें ज्वाइन करने.. और हमारी लड़ाई का हिस्सा बनने! फ़्रांस,इटली,ग्रीस,अमेरिका,ब्रिटेन,आस्ट्रेलिया,भारत,म्यांमार,चाइना जैसे गैर इस्लामिक मुल्कों से लड़ाके आते थे हमारा साथ देने.. क्यों आते थे?...क्योंकि हम सच के साथ थे.. हम बुराई के खिलाफ लड़ रहे थे.. मानवता के दुश्मनों से लड़ रहे थे.. लड़कों को तो छोड़िये लड़ाकन भी कितनी आती थी.. दुनिया के तमाम हिस्सों से स्वेच्छा से लड़कियां हमारे मानवतावादी बादशाह का जुल्म के खिलाफ जंग में साथ देने आती थी.. ज़वान औरत, मर्द और बूढ़ों को तो छोड़िये बच्चे भी खूब शरीक होते थे… और ये सब हम अपने से नहीं बोल रहे.. ये सभी इतिहास में अंकित है.. उन्हीं की किताबों, अख़बारों, पत्रिकाओं और कैसेटों में अंकित हैं.. लेकिन चूँकि सब कुछ उन्हीं के अंडरकण्ट्रोल में थी तो सबने हमारे मानवतावादी बादशाह को मानवता का दुश्मन बना के प्रोजेक्ट किया.. लेकिन अब हम उन्हीं के चीजों से अपने नायक को जगा रहे है.. उनके असल रूप को हम दुनिया के सामने ला रहे है जिसे एक साजिश के तहत नकारात्मक बना के पेश किया गया है।
जिनके एक आह्वान पे दुनिया भर से बच्चे,बूढें,ज़वान और औरतें अपना सब कुछ छोड़ छाड़ के बादशाह का साथ देने आ सकते हैं, तो क्या भला वो इतना क्रूर और पापी हो सकता है!.. आप समझ सकते है कि हमारा बादशाह कितना न्यायप्रिय और मानवतावादी रहा होगा, जिसे कि जान बुझ कर हैवान और शैतान बना कर पेश किया गया।
अब इन बाहरी प्रोपेगेंडावीर अमेरिकियों के दिन लदे.. अब हम मूलनिवासी आइसिनों के दिन शुरू.. अब हम जगना शुरू कर दिए है... सब अपना-अपना झोला झप्पट्टा पकड़ो और सीधा अमेरिका की फ्लाइट पकड़ो।
जे आइसियन बगदादी बाबा!
# जे महिषासुर का पोस्टमार्टम बाय गंगवा #
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मूलनिवासी गंगवा
खोपोली वाला 😊😊
||हलाला||
गुजर महतो और बिलसी देवी.. पति-पत्नी.. शादी के पाँच साल हो गए है.. एक बेटा है, नाम दिलीप.. हँसता-खिलता परिवार है.. गुजर महतो के पास ज्यादा खेती बारी नहीं है.. बड़े महतो के घर कमिया खटता है और परिवार का भरण पोषण करता है.. थोड़ा गुस्सैल स्वभाव का है लेकिन अपनी पत्नी से थोड़ा कम.. मने गुजर उन्नीस तो बिलसी बीस.. लड़ते-झगड़ते खूब है,लेकिन प्यार भी बहुत है.. गुजर खेतों में काम करते-करते शाम को कलाली महुआ का दारु पीने बैठ जाता और ज़रा लेट करता तो बिलसी महतवाइन सिंदवायर का सोंटा ले के अड्डे में पहुँच जाती और गुजर का गमछा पकड़ के ले सोंटा..ले सोंटा..! .. अपने साथियों के मध्य अपने को पीटता देख दारुपिये गुजर भी तैश में आ जाता और बिलसी का जोरदार प्रतिकार करने लगता.. लेकिन बिलसी तो ठहरी बीस, सोंटे की स्पीड तीन सौ साठ के पार! .. पुरे रास्ते भर गरिया-गरिया के घर लाती और बाहर खडरे(खाली) खाटी में ला के लेटा देती और खुद घर के अंदर अपने बच्चे के साथ सो जाती.. सुबह होते ही गुजर ऐसे हो जाता जैसे कुछ हुआ ही न हो.. खटिया से उठ के तालाब तरफ जाता, नित्य क्रिया से निवृत होता फिर माड़-भात खा के काम पे निकल जाता।
अभी धरम महतो के घर कुंआ कटा रहा है.. गुजर उसी कुंए में काम करने जा रहा है.. कुँए के अंदर गैता मारते हुए चैता महतो बोलता है..
“का हो गुजर.. दिलपा(दिलीप) मईए तो राती तो पूरा सोंट देले हो तोरा के मरदे आर उ भी सभे के सामने!!”
“अब की करभी चैता भाय.. सबके थोड़ी सौभाग्य मिलो है आपन जेनी(पत्नी) से माइर खाय ले.. !”
गुज़र के इतना कहते ही सब ठहाके मार के हँसने लगते हैं!
गुजर आज शाम केवल एक गिलास महुआ चढ़ाया और घर टेम पे आ गया.. नशा तो थोड़ी चढ़ी थी.. और कुँए में काम करते लोगों द्वारा ताने सुनने के कारण थोड़ा मूड ऑफ़ में था.. बिलसी आई और गंधारी साग, हरी मिर्च और भात ला के परोस दी.. भात में साग सान के जैसे ही पहला कोर मुँह में लिया झल्ला पड़ा बिलसी के ऊपर..
“आंय गे दिलपा मइया.. कोनो लुइर-धचर हो की नाय गे तोरा के सब्जी-वब्जी बनवे ले हाँ ?”
“की भेलो जे उंडरे लागल है?”
“निमक केतना डाल देलय ही!! … एतना मेहनत से सबकुछ कमाय-धमाय के आइन दो हियो तो तनी खाना तो बेस के खियाव !”
“ऐ जादा मच-मच नाय कर.. लोटवे पानी हो.. उ पनिया डाल आर खो.. निमक कम भे जीतो.. जादा नाक-मुँह टेढ़ा-मेढ़ा नाय कर!”
“तोरा अहे खातिर आनल हलियो गे तोर बाप घर से बिहा कर के.. कि तोय हमरा अहे नियर राइन्ध-बाइट के खियेबे.. मईए तोरा कुछो नाय सीखेलो गे ?”
“जे जूनढोहना!!! (तनिक गुस्से से) !! … हमर माय-बाप के बीच में नाय ला.. बताय रहल हियो… हमर मईए आर बापे हमरा के की सीखेले है से हमरा सब पता है.. तोय आपन देख तोर माईये-बप्पे की सीखेलो हो से!.. पठवा काम ने धंधा आर खाय ले खोजे है एकदम चिकन चिकन.. जेतने नूनवा वतने गुणवा.. समझली.. तो जेटा मिलल हो सेटा धकल और बाहरी खटिया में पसेर जो!”
“तोरी घरकेगुद मारो.. जादा ज़बान चलेभी गे.. अहे थरवा(थारा/थाली) अभी अइसन झबेद के मारबो ने कि मुड़िया केट के फेंकाय जीतो.. तोरा तोर बाप घर से आनल हियो तो तोरा भूखे नाय मोराय रहल हियो… खेते-कुंवे काम कर-कर के कोनो नियर खियाय रहल हियो.. समझली .. जादा बोलभी गे!!”
अब बिलसी तमतमाते हुए गुजर के पास आ जाती है..
“हाँ बोलबो.. आर जादा बोलबो… की केर लेभी से बोल?... की करभी बोल?!”
“मन तो हमरा अइसन करो हे जे तोरा हम छोइड़-छाइड़ देबो… आर हम अकेले रही!”
छोड़ने का नाम सुनते ही बिलसी का पारा सातवें आसमान पर.. अपने घुघा को कमर में खोसते हुए बोलने लगी..
“हमरा छोड़े के बात करो ही रे जूनढोहना!... हाँ!?? .. हमर बाप घार से अहे खातिर बिहा केर के आनल है रे हमरा ? .. छोड़े खातिर आनल है हमरा? … कान खोल के सुन ले.. हम तो छोड़े-ओड़े वाला नाय हियो.. अग्नि के सात फेरा लेल हियो तोर संगे.. सात जन्म के कसम खाइल हियो तोर संगे… आर तोय हमरा छोड़े के बात करे है रे! .. ई जन्म तो कि तोरा सात जन्म तक भी साथ न छोड़बो हम.. छोड़े के बात करबे रे! .. हम कूट-कूट के आटा नाय बनाय देलियो तो हमर नाम नाय बिलसी.. हाँ!”
गुजर थारा को गुस्से से सरकाता है और खटिया उठा के बाहर अंगने में सो जाता है.. !
भले ही बिलसी लड़ती-झगड़ती थी, लेकिन गुजर से बहुत प्यार करती थी.. गुज़र घर आने में लेट हो गया तो दिलीप को साथ में ले एक अधीरता के साथ गाली देती हुई पूरा कुल्ही छान मारती थी.. उसके अड्डों से हो आती थी .. और कहीं न मिला तो हताश हो घर में बैठ के रोने लगती थी.. और अपने को कोसने लगती थी.. ‘हाय हम काहे डाँट दिए थे!.. कहाँ चला गया हमर दिलपा के बप्पा.. अब आने दो घर.. अब हम कभी नहीं डाँटेंगे.. कभी नहीं झगड़ा करेंगे!”
लेकिन जैसे ही गुजर घर में प्रवेश करता बिलसी अपने झाँसी की रानी वाली फॉर्म में आ जाती.. और फिर ले डाँट-फटकार.. और ज़रूरत पड़ने पे बेलन और सोंटा!
बस ऐसे ही गुजर और बिलसी की दाम्पत्य जीवन की गाड़ी चल रही थी, लड़ाई-झगड़े और प्रेम के साथ।।
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फिर कुछ समय पश्चात उत्तर के तरफ से कुछ आदमी आये.. अलग ढंग के पहनावा पहने, मूँछ विहीन, लम्बी दाढ़ी और गोल जालीदार टोपी लगाये... चेहरे और आवाज़ में ओज और तेज़.. तक़रीर ऐसे करते कि कोई भी मन्त्रमुग्ध हो जाय.. दूसरे को कोसे तो अपने आप में शर्म महसूस होने लगे! .. पूछने पाछने पे पता चला कि इन्हें मौलवी साब कहते हैं.. और ये बहुत ही प्यारा धर्म इस्लाम का प्रचार-प्रसार करने निकले हैं.. गाँव-गाँव में रुकते हैं और अपने धर्म के बारे में सबको बताते हैं.. इस धर्म में ऊँच-नीच जैसी कोई बात नहीं हैं.. सब मुसलमान हैं तो मुसलमान हैं और कुछ नहीं! कोई ऊँच-नीच नहीं! ... जरूरतमन्दों की मदद भी खूब करते हैं और हर तरीके से करते हैं।.. . आज शाम को मौलवी साब ने गाँव के कुलमुड़वा में बैठक बुलाया है.. सो सबको वहाँ जाना हैं!।
गुज़र, चैता, खैटा,शुकर,शंकर जैसे लोग उस सभा में जाते हैं.. मौलवी साब जब बोलना शुरू हुए तो सब उसकी बातों में खो जाते है.. और जब हिन्दू धर्म में उतरे तो सबको अपने आप में हिन्दू होने में शर्म महसूस होने लगता हैं... उन्होंने पूरी इतिहास सामने रख दी.. तुम्हें क्या मिला है अब तक और आगे क्या मिलेगा? .. अगर आप इस्लाम में ईमान लाते हो तो तुम्हें क्या-क्या फायदा होगा ? वगेरह.. वगेरह.. !
वहाँ मौजूद लगभग सभी जन इस्लाम से बहुत प्रभावित होते हैं.. और इस्लाम में ईमान लाने की मंशा जताते हैं.. अगले दिन जितने भी जन इस्लाम में आना चाहते हैं वो इकट्ठे होते हैं और मौलवी साब कुरान का कलिमा पढ़ के सबको इस्लाम में विधिवत दीक्षित करवाते हैं। और इसके बाद मौलवी लोगों का कारवां अगले गाँव की ओर कूच कर जाता हैं।
इस्लाम में दीक्षित होने के बाद गुजर महतो गुजर मियां बन जाता है और बिलसी देवी बिलसी ख़ातून.. इसी तरह अन्य भी चैता मियां.. खैटा मियां.. शुकर मियां आदि.. आदि!!
गुजर महतो जैसे लोग जिनके पास नाम मात्र की जमीन थी, किसी तरह परिवार चलाते थे उसके गुजर मियां बनते ही अब उसके नाम एकड़ों में जमीन है, पहाड़ियां हैं.. और गाँव के बड़े महतो लोगों को टक्कर देने लगे हैं।
खैर मुसलमान बनते ही इनके जीवन में थोड़ा सुधार आया.. आस पड़ोस के पाँच-छः गाँवों के मुसलमानों ने मिलकर अपनी एक मस्जिद बना ली.. वहाँ पे एक मौलवी जी भी आ गए.. अब वहाँ से पाँचों वक़्त के नमाज़ सुनाई देने लगे.. वहाँ पे नियमित रूप से हर शुक्रवार को इबादत के लिए लोग जुटने लगे।
.. कुछेक समय पश्चात इनमें परिवर्तन साफ़ परिलक्षित होने लगी... बोली-चाली से लेकर पहनावे और रहन-सहन तक में.. दाढ़ी बढ़ती गई और मूँछेँ छोटी होते गई.. धोती लुंगी में परिवर्तित होने लगी.. लोगों के ज़ुबान पर उर्दू के लफ्ज़ चढ़ने लगे.. लौटों का स्थान केतली ने लिया.. पूरब में झुकने वाला सर अब पश्चिम में झुकने लगा।
महिलाओं में भी परिवर्तन आने लगे.. साड़ी पहनने का स्टाइल चेंज होने लगा.. सलवार जम्फर में ज्यादा नज़र आने लगी.. साड़ी के घुघे का स्थान दुप्पटे ने लिया.. ब्लाउज के बाँह की साइज़ बढ़ गई.. नाक के नथ की साइज़ बढ़ गई.. सिंदूर का स्थान संदल ने लिया.. डॉट..डॉट।
लेकिन बिलसी देवी अभी भी बिलसी देवी ही थी… भले ही उसका पहनावा बदल गया था लेकिन थी पहले वाली ही बिलसी देवी। .. वही हक़ पति पे जताती थी.. कुछ ज्यादा अटर-पटर बोलने सीधा सोंटा ले के हाज़िर हो जाती थी.. मने तेवर कम न हुए थे.. बदली बिल्कुल भी न थी। .. लेकिन जैसे-जैसे गुजर मियां मस्जिद में नियमित आते जाते रहा वैसे-वैसे ही वो बिलसी के ऊपर डोमिनेंट होने की कोशिश करने लगा.. लेकिन बिलसी थी तो उनसे बीस उसकी एक न चलने देती। … बोलती.. “ये मियाँ.. मैं गौर कर रही हूँ कि जब से तुम ज्यादा प्याज खाने लगे हो.. मस्जिद में आने जाने लगे हो, तब से देख रही हूँ कि तुम मेरे ऊपर रौब जमाने की कोशिश कर रहे हो.. तो ज़रा कान खोल के सुन लो.. मैं पहले जैसी थी वैसी ही हूँ और रहूँगी भी.. मेरे ऊपर रौब झाड़ने की कोशिश मत करना.. बिलसी का केवल नाम बदला है बिलसी नहीं।!”
लेकिन जैसा था कि पति-पत्नी के बीच झड़पें आम थी और नियमित होते भी रहती थी.. तो एक दिन फिर से झगड़ा सुलग उठा.. और घमासान मचने लगी.. आस पड़ोस के लोग भी आ गए.. लोग बाग़ समझाने की कोशिश करने लगे.. लेकिन कोई किसी को सुनने को तैयार ही नहीं.. बात बढ़ते गई और फिर बात छोड़ने-छाड़ने पे आ गई.. बिलसी फिर से उखड़ गई.. अपना दुपट्टा कमर में बाँधते हुए बोली..
“बता तो मियाँ हमरा कैसे छोड़ दोगे ? … कोई सामान हिये हम जे छोइड़ देभी.. !? हाँ ?”
“बस.. बहुत भे गेलो दिलावर(दिलीप) की अम्मा.. अब तोय उ बिलसी देवी नाय है जे तोरा हम नाय छोड़े पारबो! उ सात जन्म वाली .. अब तोय बिलसी खातुन है.. तोरा तो हम जखन चाहबो तखन छोइड़ देबो ! … तो हमरा माथा अभी जादा गरम नाय कर.. समझाय रहल हियो !!”
“नाय तो की करभी बता ? ?? बता!!” और भी गुस्से से बिलसी गुज़र की ओर आते हुए बोली
“तलाक दे देबो हम.. तलाक .. हां!”
“अरे जूनढोहना .. ई तलाक़ का होता है रे .. जे हमको दे देगा ? हाँ !”
इतने में ही खैटा मियां आया और गुजर को समझाने लगा .. “अरे गुजर ई का बोल रहा है रे गुस्से में .. का आलतू फ़ालतू बके जा रहा है हाँ! .. तलाक़ देगा भौजी को ? … चल बाहर चल.. अभी तुम बहुत गुस्सा में हो.. चलो मेरे साथ बाहर.. सुबह सब सही हो जाएगा!”
“ऐ खैटा भाई.. छोड़ो मुझे और फ़ालतू में बीच में न पड़ो… आज इसकी अक्ल ठिकाने लगानी ही पड़ेगी.. बहुत हो गया इसका.. बहुत सह लिया इसको”
“अरे का करेगा रे मियाँ… तनिक बताओ न !” बिलसी एकदम से सामने आ के बोली
“तोरा हम तलाक़ दे रहल हियो… तलाक़~~!! … तलाक़~~~!! … तलाक़~~~~!!!”
गुजर ये शब्द जोर-जोर से और चीख-चीख के बोलता है और बिलसी को धक्का देते हुए बाहर निकल जाता है.. उसके पीछे खैटा भागते हुए पीछे जाता है!
इधर बिलसी असंतुलित हो आँगन में गिर जाती हैं.. वहाँ मौजूद महिलाओं और खुद बिलसी को भी नहीं मालुम कि ये तलाक़ क्या होता है.. और किस चिड़िया का नाम है? .. लेकिन सबके मन में यही चल रहा है कि ये कोई चीज है जिसके बाद अलग हो सकते है, जिसको कहकर गुजर निकल गया है!
इधर बिलसी भी थोड़ी सहम गई है.. उसे नहीं पता कि गुजर क्या कह के निकल गया है.. लेकिन घबराहट बड़ी हो रही है!।
बाहर खैटा गुजर को समझा रहा है.. “अरे गुजर ई का कर दिया रे.. भौजी को तलाक़ दे दिया! .. गुस्से में तीन तलाक़ दे दिया.. इसके आगे का भी नियम मालुम है न क्या-क्या करना पड़ता है ?”
“नहीं मालूम.. और मालूम करना भी नहीं है.. जाने दो.. अब दे दिया तो दे दिया.. बहुत दिमाग खराब कर के रखी थी.. अब जो होगा सो देखा जाएगा!”
एक दिन गुजरा.. दो दिन गुजरा.. तीसरे दिन उसे अपनी गलती का अहसास हुआ.. खैटा के साथ मस्जिद गया और मौलवी साब से भेंट किया..
खैटा बोला “मौलवी साब.. इसने अपनी बीवी को गुस्से में आकर तीन तलाक़ दे दिया.. लेकिन अब इन्हें पछतावा हो रहा है.. अपनी बीवी को फिर से अपनाना चाहता है.. क्या किया जाय?”
मौलवी साब “देखो बच्चा.. इस तरह का कोई मामला होता है तो कुरान की रौशनी में इसका उपाय है जिसे ‘हलाला’ कहते है।.. जिसके मुताबिक अगर कोई खामिंद अपनी खातुन को तीन तलाक़ दे देता है और दुबारा उसे अपनाना चाहता है तो उसे हलाला से गुजरना अनिवार्य है!”
“ये हलाला क्या होता है मौलवी साब?”
“हलाला अपनी खातुन को दुबारा हासिल करने का तरीका है.. जिसमें आपकी खातुन को पहले किसी से निकाह करवाना पड़ेगा फिर जिस आदमी से उसका निकाह होगा वो आदमी आपकी खातुन को तीन तलाक़ देगा उसके बाद फिर आप उससे दुबारा निकाह कर सकते है!”
“अच्छा तो फिर निकाह ही होगा न.. उसके बाद तलाक़ दे देगा न ?”
“नहीं.. वो निकाह भले ही एक दिन का हो लेकिन वो पूरी निकाह होगी.. एक आम मियाँ-बीवी की तरह.. वो एक आम मियां-बीवी की तरह एक दूसरे के साथ समय गुजारेंगे.. ज़ुआकी तालुकात (जिश्मानी सम्बन्ध) अनिवार्य है.. और उसके निकाह के मेहर का खर्च उसका शौहर उठाएगा।”
“लेकिन ऐसा कौन होगा जो सिर्फ एक दिन के लिए निकाह करेगा.. और अगर निकाह करने के बाद तलाक़ न दिया तो?”
“आपको जिसपे बहुत ज्यादा विश्वास हो उससे निकाह करवाइये.. और अगर कोई आपके नज़र में ऐसा न हो तो मैं इस हलाला के लिए राजी हूँ.. मैं पूरी गारन्टी देता हूँ कि निकाह के अगले दिन ही आपकी खातुन को तलाक़ दे दूँगा!”
“मौलवी साब .. अगर बिना हलाला के ही निकाह करेंगे तो क्या होगा?”
“तौबा.. तौबा.. लाहौल-बिला-कुव्वत.. कुफ़्र होगा कुफ़्र... भयंकर कुफ़्र होगा.. अल्लाह ताला इसके लिए तुम्हें जहन्नम में जगह देगा!”।
“ठीक है.. ठीक है.. मौलवी साब .. हम हलाला के लिए तैयार है”.
सभी राय मशविरा ले के गुजर और खैटा घर लौटते है..
इधर बिलसी उस झगड़े के बाद थोड़ी गुमसुम है.. गुजर भी ठीक से बात नहीं कर रहा उससे! .. घर आकर गुजर बिलसी से हिम्मत जुटाकर बोलता है..
“दिलावर की अम्मा.. अभी हम मौलवी साब से भेंट करके आये है.. हम तुमसे दुबारा निकाह करने वाले है!”
बिलसी के गुमसुम चेहरे पे अचानक से ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है.. बोलती है .. “का कह रहे हो दिलावर के अब्बा.. हम सच में निकाह करने वाले है?”
“हाँ.. लेकिन उससे पहले तुम्हें हलाला से गुजरना होगा”
“ये हलाला क्या होता है?” बिलसी सवालिया लहज़े में पूछती है..
इसके बाद गुजर हलाला के बारे में पूरा बताता है.. सबकुछ सुनने के बाद बिलसी एकदम से निढाल हो जाती है..
गुजर समझाता है.. “अरे दिलावर की अम्मा.. सिर्फ एक दिन की हो बात है.. वैसे भी मौलवी साब बहुत ही अच्छे और भले इंसान है.. तुमको कुछ न होगा… और अगर हम ये न करते है तो कुफ़्र होगा कुफ़्र.. और कुफ़्र की सज़ा बहुत शदीद होती है.. हम मुसलमान कुरान के खिलाफ नहीं जा सकते.. तुम्हें हलाला करना ही पड़ेगा.. अगर तुम मेरी बीवी बने रहना चाहती हो तो तुम्हें एक दिन का निकाह करना ही पड़ेगा!”
बिलसी न चाहते हुए भी हलाला के लिए हामी भर देती है!
अगले दिन निकाह की तैयारी होती है.. दूल्हा मौलवी साब बने हुए है! .. मेहर तय होता है और निकाह होता है..
निकाह होने के बाद बिलसी एकदम से बेजान पड़ी हुई है.. पत्थर सी जड़ हो गई है.. उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी कि उसे तीन तलाक़ के बदले इस दौर से गुजरना पड़ेगा!.. किसी गैर मर्द के साथ सोना पड़ेगा.. और अगर ऐसा नहीं करती है तो कुफ़्र की भागीदार बनेगी।.. एक स्त्री मन और हृदय को पत्थर की भाँति कठोर बना वह मौलवी के सामने लेट जाती है.. मौलवी भूखे भेड़िये की तरह उसके शरीर पे टूट पड़ता है.. नोच-नोच के खाने लगता है.. बेजान सी लेटी बिलसी के आँखों से आँसू बस अनवरत बहे जा रहे हैं। बिलसी के लिए तो इस रात की एक-एक घड़ी किसी युग से कम नहीं लग रहा है.. कटे नहीं कट रहा है.. एक-एक पल के साथ लगता है कि रात बढ़ती जा रही है.. और गहराती जा रही है.. लगता है कि सुबह जैसे रूठ गया हो.. उसको आदर करके बुलाने पर भी नहीं आ रहा है.. बिलसी बस सुबह के इंतज़ार में मांस के लोथड़े की भाँति लेटी रही और बूढ़ा मौलवी पूरी रात उसके शरीर को नोचता रहा!
किसी औरत के लिए ये पल कैसा रहा होगा इसे हम सिर्फ कल्पना कर सकते है और कुछ नहीं! .. औरतें इस पल को कैसे झेलती होगी!!
खैर जैसे-तैसे सुबह हुई और मौलवी से तलाक़ लेने के बाद दुबारा बिलसी की शादी गुजर से तारीख निर्धारित की जाती है। और फिर से उन दोनों के दाम्पत्य जीवन की गाड़ी आगे बढ़ती है.. लेकिन अब बिलसी पूरी तरह बदल गई है.. बिलसी अब बिलसी देवी नहीं रही बल्कि पूरी तरह बिलसी खातुन बन चुकी है।.. अब वो अपने शौहर के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलती है… जहाँ वो सात जन्म तक पीछा न छोड़ने वाली बनती थी अब वो अपने शौहर के ज़रा से गुस्से से भी काँप जाती है.. उनकी भरसक यही कोशिश रहती कि दिलावर के अब्बा किसी तरह से गुस्सा न हो जाए और तीन तलाक़ न कह दे! .. जहाँ वो गुजर के कुछ कहने पे सोंटा से सोंट देती थी वहीँ अब उसके गुस्सा होने पे सोंटा थमा देती है और बोलती है “लगे तो आप मुझे सोंट दीजिये लेकिन वो तीन शब्द कभी भी दुबारा न बोलियेगा।।”
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गंगा महतो
खोपोली
(नोट: ये कहानी गंगवा की कल्पना शक्ति की उपज मात्र है.. अगर किसी घटना या व्यक्ति से इसका सम्बन्ध होता है तो ये महज एक संयोग होगा! 😊)